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अदम की शायरी में कोई लाग लपेट नहीं है, आक्रामकता है, तड़प है और उसी तड़प से सना हुआ व्यंग्य है

                
                                                         
                            दुष्यंत कुमार ने अपनी ग़ज़लों से शायरी की जिस नयी राजनीति की शुरुआत की थी, अदम ने उसे उस मुकाम तक पहुँचाने की कोशिश की है, जहाँ से एक एक चीज़ बगैर किसी धुंधलके के पहचानी जा सके-
                                                                 
                            

जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में
गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में

बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गयी
राम सुधि की झौपड़ी सरपंच की चौपाल में




अदम की निपट गंवई अंदाज़़ में, महानगरीय चकाचौंध और चमकीली कविताई को हैरान कर देने वाली अदा सबसे जुदा और विलक्षण है-

किसको उम्मीद थी जब रौशनी जवां होगी
कल के बदनाम अंधेरों पे मेहरबां होगी

खिले हैं फूल कटी छातियों की धरती पर
फिर मेरे गीत में मासूमियत कहाँ होगी

आप आयें तो कभी गाँव की चौपालों में
मैं रहूँ या न रहूँ भूख मेज़बां होगी


अदम अपनी शायरी में ठेठ गंवई दो टूकपन और बेतकल्लुफी से काम लेते हैं। उनके कथन में कोई लाग लपेट नहीं है, आक्रामकता है, तड़प है  और उसी तड़प से सना हुआ व्यंग्य है-

ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नजारों में
मुसलसल फन का दम घुटता है इन अदबी इदारों में

अदीबों ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ
मुलम्मे के सिवा क्या है फ़लक के चाँद तारों में

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एक वर्ष पहले

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