अदब लाख था फिर भी उन की तरफ़
नज़र मेरी अक्सर रही देखती
- अज्ञात
अब इस से पहले कि रुस्वाई अपने घर आती
तुम्हारे शहर से हम बा-अदब निकल आए
- मुईद रशीदी
दूर बैठा ग़ुबार-ए-'मीर' उस से
इश्क़ बिन ये अदब नहीं आता
- मीर तक़ी मीर
इश्क़ अदब है तो अपने आप आए
गर सबक़ है तो फिर पढ़ा मुझ को
- सरफ़राज़ नवाज़
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