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आज का शब्द: अविराम और प्रेमलता त्रिपाठी की कविता- नव ज्योति जलाओ

अमर उजाला
                
                                                         
                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- जिसमें गति हो या जो चलायमान हो, विरामहीन, बिना विश्राम लिए हुए। प्रस्तुत है प्रेमलता त्रिपाठी की कविता- नव ज्योति जलाओ 
                                                                 
                            

प्रीति जगे मन आँगन में सब अंध कटे नव ज्योति जलाओ।
मान करो शुचि कर्म विधा तब प्रानन से जग रीति सजाओ।

राग नहीं अनुराग बढ़े मन द्वेष मिटे भव बंधन सारा,
लेख लिलार न मेट सके प्रभु नाम सुधा नित गंग नहाओ।

आन रहे अभिमान नसे हिय प्रेम जगे सुखदा वसुधा पै,
शोध करें प्रतिशोध नहीं तन सेवक हो मति धीर कहाओ।

घोर बढ़ी विपदा जन की अब देव सदा यह दीन पुकारे
पीर हरो घन नीर बनो तन ताप घटे सब धुंध मिटाओ।

रंग भरो सब जीवन में पुनि होय निरापद प्रान हमारा
छंद बने नव गीत सधे अविराम गहें पथ प्रेम बढ़ाओ।

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9 महीने पहले

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