'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- वायु, जिसका अर्थ है- पाँच तत्वों में से एक जो पृथ्वी के चारों ओर ऊपर आकाश तक भरा है, जिसे सब प्राणी साँस लेते समय अंदर खींचते और बाहर फेंकते हैं, पवन, हवा। प्रस्तुत है हरिवंशराय बच्चन की कविता- क्या जला, जलकर बुझा
वायु बहती शीत-निष्ठुर!
ताप जीवन श्वांस वाली,
मृत्यु हिम उच्छवास वाली।
क्या जला, जलकर बुझा, ठंढा हुआ फिर प्रकृति का उर!
वायु बहती शीत-निष्ठुर!
पड़ गया पाला धरा पर,
तृण, लता, तरु-दल ठिठुरकर
हो गए निर्जीव से--यह देख मेरा उर भयातुर!
वायु बहती शीत-निष्ठुर!
थी न सब दिन त्रासदाता
वायु ऐसी--यह बताता
एक जोड़ा पेंडुकी का डाल पर बैठा सिकुड़-जुड़!
वायु बहती शीत-निष्ठुर!
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