आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आज का शब्द: वट और अज्ञेय की कविता- बोलो, चाहे धीरे-धीरे बोलो

हिंदी हैं हम
                
                                                         
                            वट का अर्थ है- बरगद का पेड़। अमर उजाला 'हिंदी हैं हम' शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- वट। प्रस्तुत है अज्ञेय की कविता- बोलो, चाहे धीरे-धीरे बोलो
                                                                 
                            


आओ बैठें 
इसी ढाल की हरी घास पर। 
माली-चौकीदारों का यह समय नहीं है, 
और घास तो अधुनातन मानव-मन की भावना की तरह 
सदा बिछी है—हीर, न्यौतती, कोई आ कर रौंदे। 

आओ, बैठो। 
तनिक और सट कर, कि हमारे बीच स्नेह-भर का व्यवधान रहे, 
बस, 
नहीं दरारें सभ्य शिष्ट जीवन की। 

चाहे बोलो, चाहे धीरे-धीरे बोलो, स्वगत गुनगुनाओ, 
चाहे चुप रह जाओ— 
हो प्रकृतस्थ : तनो मत कटी-छँटी उस बाड़ सरीखी, 
नमो, खुल खिलो, सहज मिलो 
अंत:स्मित, अंत:संयत हरी घास-सी। 

क्षण-भर भुला सकें हम 
नगरी की बेचैन बुदकती गड्ड-मड्ड अकुलाहट— 
और न मानें उसे पलायन; 
क्षण भर देख सकें आकाश, धरा, दूर्वा, मेघाली, 
पौधे, लता दोलती, फूल, झरे पत्ते, तितली-भुनगे, 
फुनगी पर पूँछ उठा कर इतराती छोटी-सी चिड़िया— 
और न सहसा चोर कह उठे मन में— 
प्रकृतिवाद है स्खलन 
क्योंकि युग जनवादी है। 

क्षण-भर हम न रहें रह कर भी : 
सुनें गूँजें भीतर के सूने सन्नाटे में 
किसी दूर सागर की लोन लहर की 

जिसकी छाती की हम दोनों छोटी-सी सिहरन हैं— 
जैसे सीपी सदा सुना करती है। 
क्षण-भर लय हों—मैं भी, तुम भी, 
और न सिमटें सोच कि हमने 
अपने से भी बड़ा किसी भी अपर को क्यों माना! 
आगे पढ़ें

4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर