'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- प्राणप्रतिष्ठा, जिसका अर्थ है- किसी देवी-देवता आदि की मूर्ति की स्थापना करके उसकी पूजा-अर्चना आरंभ करने से पहले मंत्रोंच्चार आदि से प्रतिष्ठित करना, किसी प्रतिमा में मंत्रों आदि के द्वारा देवता का किया जाने वाला आह्वान। प्रस्तुत है रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’की हाइकु कविता- जीवन तरु
1
स्नेह सुरभि
बिखरे दिग्दिगन्त
पवन पंख।
2
साँसों की डोर
तेरे ही हाथों थमे
दोनों ही छोर।
3
मुट्ठी में बचे
जो भी दो चार पल
अर्पित उसे।
4
कर्म का लेखा
लिखता है नियन्ता
जग न लिखे।
5
प्रपञ्च बोए
जब उगी फसल
फिर क्यों रोए?
6
अश्वत्थ तुम
बने हो प्राणवायु,
दुर्दिन छाए।
7
ईर्ष्या अनल
कब बुझाए बुझी
थके सागर
8
ढलता सूर्य
सब पाखी उड़े हैं
नीड़ की ओर।
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