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आज का शब्द: पसार और बुद्धिनाथ मिश्र की कविता- फूल झरे

आज का शब्द
                
                                                         
                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- पसार, जिसका अर्थ है- प्रसार, फैलाव, लंबाई, चौड़ाई, दालान। प्रस्तुत है बुद्धिनाथ मिश्र की कविता- फूल झरे
                                                                 
                            

फूल झरे जोगिन के द्वार
हरी-हरी अँजुरी में
भर-भर के प्रीत नई
रात करे चाँद की गुहार ।

केसर-क्यारी से
बहकी हिरना साँवरी
ठुमुक-ठुमुक चले
कहीं रुके नहीं पाँव री
कहाँ तेरा हाट-बाट
कहाँ तेरा गाँव री ?

बादल की चुनरी पसार
काँप-काँप, अंग-छवि
बावरी अँजोरिया
ताल में निहारे बार-बार ।

पीपर की छाँह बसे
छुई-मुई प्रीत रे
अधरों से झाँक रहे
अधसँवरे गीत रे
अनजाने नाम लिखे
सीपियों के मीत रे

रेत भरे तीर को बुहार
रोम-रोम से अधीर
दर्द सब निचोड़ कौन
भेज रहा प्रिया को दुलार ।

बगुले-सी आस तिरे
मन में दिन-रैन रे
धनही पगडंडी पर
बिछुआ बेचैन रे
सुलझ रहे स्वप्न-बंध
उलझ रहे नैन रे

कौन परी तोड़ गयी हार!
एक-एक पंखुरी पर
अल्पना रचा गयी
बाँसुरी सुना गयी मल्हार ।

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6 महीने पहले

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