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आज का शब्द: न्यस्त और सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की कविता 'हिंदी के सुमनों के प्रति पत्र'

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हिंदी हैं हम शब्द-शृंखला में आज का शब्द है न्यस्त जिसका अर्थ है 1. रखा या धरा हुआ 2. जमाया हुआ 3. चुनकर सजाया हुआ। कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपनी कविता में इस शब्द का प्रयोग किया है। 

मैं जीर्ण-साज बहु छिद्र आज,
तुम सुदल सुरंग सुवास सुमन
मैं हूँ केवल पदतल-आसन,
तुम सहज विराजे महाराज।

ईर्ष्या कुछ नहीं मुझे, यद्यपि
मैं ही वसंत का अग्रदूत,
ब्राह्मण-समाज में ज्यों अछूत
मैं रहा आज यदि पार्श्वच्छवि।

तुम मध्य भाग के, महाभाग!—
तरु के उर के गौरव प्रशस्त।
मैं पढ़ा जा चुका पत्र, न्यस्त
तुम अलि के नव रस-रंगराग।

देखो, पर, क्या पाते तुम 'फल'
देगा जो भिन्न स्वाद रस भर,
कर पार तुम्हारा भी अंतर
निकलेगा जो तरु का संबल।

फल सर्वश्रेष्ठ नायाब चीज़
या तुम बाँधकर रँगा धागा,
फल के भी उर का कटु त्यागा;
मेरा आलोचक एक बीज। 

एक वर्ष पहले

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