'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- निंदा, जिसका अर्थ है- किसी की वास्तविक या उचित बुराई या दोष बतलाना, अपकीर्ति, बदमानी। प्रस्तुत है गोपाल सिंह नेपाली की रचना- मेरा धन है स्वाधीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताजों पर आसीन क़लम
जिसने तलवार शिवा को दी
रोशनी उधार दिवा को दी
पतवार थमा दी लहरों को
ख़ंजर की धार हवा को दी
अग-जग के उसी विधाता ने, कर दी मेरे आधीन क़लम
रस-गंगा लहरा देती है
मस्ती-ध्वज फहरा देती है
चालीस करोड़ों की भोली
क़िस्मत पर पहरा देती है
संग्राम-क्रांति का बिगुल यही, है यही प्यार की बीन क़लम
कोई जनता को क्या लूटे
कोई दुखियों पर क्या टूटे
कोई भी लाख प्रचार करे
सच्चा बनकर झूठे-झूठे
अनमोल सत्य का रत्नहार, लाती चोरों के छीन क़लम
तुलसी चंदा तो सूर-सूर
केशव-से तारे दूर-दूर
बाक़ी हैं जुगनू, मैं तो बस
जागरण-पक्ष में चूर-चूर
रवि लाने वाला दीपक हूँ, मेरी लौ में लवलीन क़लम
बस मेरे पास हृदय-भर है
यह भी जग को न्योछावर है
लिखता हूँ तो मेरे आगे
सारा ब्रह्मांड विषय-भर है
रँगती चलती संसार-पटी, यह सपनों की रंगीन क़लम
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