'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- मरघट, जिसका अर्थ है- वह घाट या स्थान जहाँ मुर्दे फूँके जाते हैं, मुर्दों को जलाने की जगह, श्मशान घाट, मसान। प्रस्तुत है गोपाल सिंह नेपाली की कविता- नज़रों के तीर बहुत देखे
जब दर्द बढ़ा तो बुलबुल ने, सरगम का घूँघट खोल दिया
दो बोल सुने ये फूलों ने मौसम का घूँघट खोल दिया
बुलबुल ने छेड़ा हर दिल को, फूलों ने छेड़ा आँखों को
दोनों के गीतों ने मिलकर फिर शमा दिखाई लाखों को
महफ़िल की मस्ती में आकर
सब कोई अपनी सुना गए
जब काली कोयल शुरू हुई, पंचम का घूँघट खोल दिया
जब दर्द बढ़ा तो बुलबुल ने, सरगम का घूँघट खोल दिया
धरती से अंबर अलग हुआ, कानों में सरगम लिए हुए
अंबर से धरती अलग हुई, होंठों पर शबनम लिए हुए
तारों से पहरे दिलवाकर
आकाश मिला था धरती से
किरनों का बचपन यों मचला, नीलम का घूँघट खोल दिया
जब दर्द बढ़ा तो बुलबुल ने, सरगम का घूँघट खोल दिया
हों द्वार झरोखे या कलियाँ, जीवन है खुलने-खिलने में
पलकें हों या काली अँखियाँ, जीवन है हिलने-मिलने में
तारों के छुपते-छुपते ही
किरनों ने छू जो दिया उन्हें
शरमाकर मुस्काई कलियाँ, शबनम का घूँघट खोल दिया
जब दर्द बढ़ा तो बुलबुल ने, सरगम का घूँघट खोल दिया
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