हिंदी हैं हम शब्द-श्रृंखला में आज का शब्द है कंठ जिसका अर्थ है 1. गला 2. गले की वे नलियां जिनसे आवाज़ निकलती है 3. गले से निकले स्वर। कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ने अपनी कविता में इस शब्द का प्रयोग किया है।
चिड़िया को लाख समझाओ
कि पिंजड़े के बाहर
धरती बहुत बड़ी है, निर्मम है,
वहां हवा में उन्हें
अपने जिस्म की गंध तक नहीं मिलेगी।
यूं तो बाहर समुद्र है, नदी है, झरना है,
पर पानी के लिए भटकना है,
यहां कटोरी में भरा जल गटकना है।
बाहर दाने का टोटा है,
यहां चुग्गा मोटा है।
बाहर बहेलिए का डर है,
यहां निर्द्वंद्व कंठ-स्वर है।
फिर भी चिड़िया
मुक्ति का गाना गाएगी,
मारे जाने की आशंका से भरे होने पर भी,
पिंजरे में जितना अंग निकल सकेगा, निकालेगी,
हरसूं ज़ोर लगाएगी
और पिंजड़ा टूट जाने या खुल जाने पर उड़ जाएगी।
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