'हिंदी हैं हम' शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- जनक, जिसका अर्थ है- जन्मदाता, पिता, बाप, सीता के पिता। प्रस्तुत है बालकृष्ण शर्मा नवीन की कविता- हम गरज उठे कर घोर नाद
हम ज्योति पुंज दुर्दम, प्रचंड,
हम क्रांति-वज्र के घन प्रहार,
हम विप्लव-रण-चंडिका-जनक,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
हम गरज उठे कर घोर नाद,
हम कड़क उठे, हम कड़क उठे,
अंबर में छायी ध्वनि-ज्वाला,
हम भड़क उठे, हम भड़क उठे!
हम वज्रपाणि हम कुलिश हृदय,
हम दृढ़ निश्चय, हम अचल, अटल
हम महाकाल के व्याल रूप,
हम शेषनाग के अतुल गरल!
हम दुर्गा के भीषण नाहर,
हम सिंह-गर्जना के प्रसार
हम जनक प्रलय-रण-चंडी के,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
हमने गति देकर चलित किया
इन गतिविहीन ब्रह्मांडों को,
हमने ही तो है सृजित किया
रज के इन वर्तुल भांडों को;
हमने नव-सृजन-प्रेरणा से
छिटकाये तारे अंबर में,
हम ही विनाश भर आए हैं
इस निखिल विश्व-आडंबर में;
हम स्रष्टा हैं, प्रलयंकर हम,
हम सतत क्रांति की प्रखर धार—
हम विप्लव-रण-चंडिका-जनक,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
हमने अपने मन में की ‘हाँ!'
औ' प्रकृति नर्तकी नाच उठी!
हमने अपने मन में की 'ना!'
औ' महाप्रलय की आँच उठी!
जग डग-मग-डग-मग होता है
अपने इन भृकुटि-विलासों से,
सिरजन, विनाश, होने लगते
इन दायीं-बायीं श्वासों से;
हम चिर विजयी; कर सका कौन
हठ ठान हमारा प्रतीकार?
हम विप्लव-रण-चंडिका-जनक,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
अपने शोणित से ऊषा को
हम दे आये कुंकुम-सुहाग,
आदर्शों के उद्दीपन से
हमने रवि को दी अमित आग;
माटी भी उन्नत-ग्रीव हुई
जब नव चेतनता उठी जाग,
जीवन-रँग फैला, जब हमने
खेली प्राणों की रक्त फाग;
हो चला हमारे इंगित पर
जग में नव जीवन का प्रसार,
हम जनक प्रलय-रण-चंडी के,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
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