आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आज का शब्द: एकल और गिरिराज किराडू की कविता- जहाँ कच्ची ईंटें बनती हैं

आज का शब्द
                
                                                         
                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- एकल, जिसका अर्थ है- अकेला, अनुपम, बेजोड़। प्रस्तुत है गिरिराज किराडू की कविता-  जहाँ कच्ची ईंटें बनती हैं
                                                                 
                            

जहाँ कच्ची ईंटें बनती हैं उस जगह को देखते हुए लगता कई घर खड़े हैं 
बल्कि थोड़ी ऊँचाई 
जैसे कि छत से 
दिखता कि 
कोई बस्ती-सी है 
बल्कि थोड़ी और ऊँचाई 
जैसे कि आकाश से 
मालूम होता कि 
कोई नगर है एक दूसरे के आँगन में खुलते कई दरवाज़ें हैं शामियाने जैसी 
लंबी एकल छत है दरारों जैसी गलियाँ हैं जिनमें अपने बचपन में हम कई 
एक दूसरे को ढूँढ़ रहे हैं 
बल्कि थोड़ी और ऊँचाई 
जैसे कि कविता से 
झाँकता कि 
शामियाना कई छतों में विसर्जित हो रहा है दरारें गलियों में बँट रही हैं ढूँढ़ना 
छिपने में खुल रहा है घर 
फिर से ईंटें हुए जा रहे हैं 
और 
वे इतनी कोमल हैं कि हम देखने से वापस लौटते हुए कई सारी थैले में भर लाए हैं 

2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर