'हिंदी हैं हम' शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- बेबस, जिसका अर्थ है- जिसका वश न चले, विवश, लाचार, पराधीन, परवश। प्रस्तुत है माखनलाल चतुर्वेदी की कविता- सूझ, का साथी-मोम-दीप मेरा!
सूझ, का साथी-
मोम-दीप मेरा!
कितना बेबस है यह
जीवन का रस है यह
छनछन, पलपल, बलबल
छू रहा सवेरा,
अपना अस्तित्व भूल
सूरज को टेरा-
मोम-दीप मेरा!
कितना बेबस दीखा
इसने मिटना सीखा
रक्त-रक्त, बिन्दु-बिन्दु
झर रहा प्रकाश सिन्धु
कोटि-कोटि बना व्याप्त
छोटा सा घेरा!
मोम-दीप मेरा!
जी से लग, जेब बैठ
तम-बल पर जमा पैठ
जब चाहूँ जाग उठे
जब चाहूँ सो जावे,
पीड़ा में साथ रहे
लीला में खो जावे!
मोम-दीप मेरा!
नभ की तम गोद भरें-
नखत कोटि; पर न झरें
पढ़ न सका, उनके बल
जीवन के अक्षर ये,
आ न सके उतर-उतर
भूल न मेरे घर ये!
इन पर गर्वित न हुआ
प्रणय गर्व मेरा
मेरे बस साथ मधुर-
मोम-दीप मेरा!
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