'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- आरोहण, जिसका अर्थ है- चढ़ना, सवार होना। प्रस्तुत है राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल की कविता- निर्माण दिशा की राह खोलती
स्वातंत्र्य समर का आरोहण यह लोक शक्ति का रक्त ज्वाल
संत्तावन का शंखनाद था, विदेशियों का महाकाल।।
वर्तमान की संबल कहानी
बीते अतीत का बोल बोलती
आहुतियों की रक्त धार
निर्माण दिशा की राह खोलती
संत्तावन की लौह क्रांति को
आज सहज विद्रोह बताना
मोड़ इमारत इतिहासों की
राजों के बल श्रेय चढ़ाना
करो मरो की सरगम वह जन जीवन का मुश्किल सवाल
स्वातंत्रय समर का आरोहण यह लोक शक्ति का रक्त ज्वाल।।
त्रस्त अंचलों की करुणा की
विधवा सांसे सूनी राहें
बंधन नहीं मृत्यु आलिंगन
करने चली करोड़ों बांहे
वह निर्बल जनता जिसने
बलिदान का आह्नान किया था
तात्या मंगल लक्ष्मी का
जनता ने ही निर्माण किया था
ब्रिटिश हुकूमत झेल गयी वह जन उच्छावासित भूमि चाल
स्वातंत्र्य समर का आरोहण यह लोक शक्ति का रक्त ज्वाल।।
जन के बलिदानी वीरों का
इतिहास अभी तो लिखना है
बेपद हुकूमत शाही का
अभिशाप अभी तो मिटना है
रोटी और कमल की कीमत
इतनी कभी न सस्ती होगी
जिसके विरुद्ध हुंकार उठा
शिक्षित शोषण की बस्ती होगी
भारत माता की जय ध्वनि से थर्राया भूमंडल विशाल
स्वातंत्र्य समर का आरोहण यह लोक शक्ति का रक्त ज्वाल।।
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