"पुश्किन की कविताएं रूस के हर नौजवान के पहले होठों पर फिर दिल में हैं। पुश्किन राजद्रोहियों की लीडर है।" रूसी कवि पुश्किन के बारे में यह बातें फैलने लगी थीं। उनकी बढ़ती हुई प्रसिद्धि उनके शुभचिंतकों के लिए चिंता का कारण बनती जा रही थी। पुश्किन की हर कविता अधिकारियों का ध्यान खींच रही थी।
पुश्किन के पिता, पुश्किन के उदारवादी विचारों के डरे हुए थे, पुश्चिन (उनके एक मित्र) ने लिखा कि एक बार नोवस्की प्रॉसपेक्ट में उनकी पुश्किन के पिता से भेंट हो गई। "मैंने पुश्किन का हाल-चाल पूछा तो उन्होंने खीज कर उत्तर दिया":
"तुम चाहते हो कि मैं उसकी प्रसिद्धि की चर्चा करूं? इसके अलावा मेरे पास कोई काम नहीं... तुमने उसके नए खुराफ़ातों के बारे में सुना...?"
पुश्किन एक के बाद एक विपत्तियों को आमंत्रण दे रहे थे। दो साल पीटर्सबर्ग में रहने के बाद वे वहां के सोसाइटी-जीवन, जुआघरों, षड्यंत्रों, नृत्योत्सवों और यौन-संबंधों से ऊब चुके थे। उन्हें अपना जीवन एक वृहत शून्य लगता था और अंतर से आवाज़ आती थी कि उनकी नियति कहीं और है... और अपनी जड़ता को तोड़ने के लिए, भाग्य को चुनौती देने के लिए, उन्होंने एक के बाद एक, ख़तरे उठाने शुरू कर दिए. वे निरंतर अवसाद में रह रहे थे।
"....अब में कुछ से कुछ हो चुका हूं
जीवन के सुनहरे दिन, गुम हैं
वे उल्लास, उद्धृत-मूर्खताएं,
जुए. स्वतंत्रता और काव्य प्रेम
सपने की तरह बीत गए, खो गए
अब तुम मुझे किसी भोज में,
हाथ में शराब का गिलास लिए
ग़मगीन पाओगे, और
मेरे हाल पर अचरज नहीं करोगे"
मार्च, 1820 में उन्होंने प्रिंस वायजेमस्की को लिखा:
"एक कवि के लिए पीटर्सबर्ग भयानक रूप से दमघोंटू है। मुझमें दूसरे क्षितिज छूने की प्यास है। मैं हफ्ते-दर-हफ्ते मूर्ख और बूढ़ा होता चला जा रहा हूँ। और घंटे-दर घंटे कमज़ोर।"
इसके बाद पीटर्सबर्ग के शक्तिशाली एरिस्टोक्रेटों और पुश्किन के बीच खुली जंग चल पड़ी। पीटर्सबर्ग के एक ड्राइंग रूम से दूसरे ड्राइंग-रूमों में, एक थिएटर से दूसरे थिएटरों में अफ़वाह फैल गई कि राजनैतिक कविताएं लिखने के दंड-स्वरूप पुश्किन को खुफिआ-पुलिस-ब्यूरो में कोड़ों से पीटा गया। जब पुश्किन के एक शुभचिंतक ने उन्हें इसकी सूचना दी तो पुश्किन शर्म और क्रोध से खौल उठे। पुश्किन ऐसा अपमान सहने के लिए नहीं बने थे। वे प्रतिशोध लेना चाहते थे, लेकिन किससे?
अपराधी अदृश्य था। सिर्फ एक काम किया जा सकता था - सीधे ज़ार को लिखा जाए। ज़ार रूस के राजा को कहा जाता था।
पुश्किन ने राजा को पत्र तो लिखा लेकिन भेजी नहीं, पत्र बाद में पुश्किन के काग़ज़ों में पाया गया।
साभार - किताब 'पुश्किन'
संवाद प्रकाशन
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