अध्यात्म जिज्ञासु विजया शर्मा की ‘शिवमया’ (सर्वभाषा प्रकाशन) आज के समय में अनूठी पुस्तक है। यह किसी ग्रंथ की चेष्टा नहीं करती। नहीं, यह किसी धर्मशास्त्र की मीमांसा का दावा। यह मन का सहज उद्गार है। वह मन, जो शिव के सौंदर्य में वीतराग होकर भी राग से भरा रहता है। शिव, विजया शर्मा के लिए, न तो केवल भगवान हैं, न तो केवल विराग के प्रतीक। शिव उनके लिए एक जीवित संवेदना हैं। वह मौन जो सब कुछ कहता है। वह दूरी जो पास होकर भी बनी रहती है। वह उजास जिसमें लौ भी थरथराती रहती है।
यह पुस्तक पढ़ते हुए ऐसा अहसास होता है, सावन की सोमवारी हो, या प्रदोष के समय, जब स्त्रियाँ व्रत थाल सजाती हैं, उनके मन के भीतर एक ही अभिलाषा पलती है, शिव-सा वर। यह बात बहुत-सी स्त्रियाँ कहती हैं। उसमें भक्ति का सुंदर रस है। उसमें सौंदर्य की एक कोमल धारा है। उसमें अनपहुँची-सी पवित्रता है। कल्पना का वह पुरुष अलौकिक है, अविनाशी है। और अटूट है।
पर मन की यह चाह एक सवाल भी बनता है। यदि सचमुच शिव जैसा पुरुष जीवन में उतर आए। विरागी। वीतरागी। जटाजूटधारी। भस्म-लेपित। संसारी आसक्ति से दूर। मोह-माया से परे। सब कुछ त्याग देने वाला। तो क्या प्रेम का वह कोमल फूल उसमें टिक पाएगा?
शिव आकर्षण हैं। पर शिव दैनंदिन जीवन की सरल गृहस्थी नहीं हैं। स्त्री मन प्रायः शिव की उदारता चाहता है। उसकी शांति चाहता है। उसकी निर्लेपता चाहता है। पर प्रेम को तो स्पर्श चाहिए। साहचर्य चाहिए। एक ऐसी उपस्थिति चाहिए, जो केवल ऊपर से न उतरे, भीतर भी बसे।
यही कारण है कि स्त्रियाँ शिव को चाहती हैं, पर शिव के साथ नहीं जी पाती हैं। शिव को चाहना सरल है। शिव को सहना कठिन। शिव-सा वर माँगना सरल है। शिव-सा जीवन पाना कठिन। क्योंकि कल्पना में शिव पुष्प हैं। पर यथार्थ में वे राख भी हैं। भस्म भी हैं। श्मशान की नीरवता भी हैं। ऐसे शिव यदि घर की चौखट लाँघते उतर आएँ, तो क्या उनका स्वागत उसी सहजता से होगा? क्या कोई स्त्री उस पुरुष के साथ अपना संसार रच पाएगी, जो संसार को ही माया मानकर त्याग चुका हो?
शिव के साथ प्रेम, केवल अनुराग नहीं, त्याग भी माँगता है। वहाँ श्रृंगार है, पर वह अलंकारों से नहीं, आत्मा की निस्तब्धता से उपजता है। वहाँ संग है, पर वह अधिकार से नहीं, समर्पण से फलता है। शायद इसी कारण शिव को चाहना सरल है। पर उन्हें स्वीकारना कठिन। मन कामना करता है सौम्य, सुहावने, स्नेहिल शिव की। पर जो शिव आते हैं, वे भीतर के सारे मोह को भस्म कर देते हैं। वे भीतर के सारे आसक्त को विराग में धूप देते हैं।
और तब सवाल उठता है, क्या हम सचमुच शिव को चाहते हैं? या केवल उनकी एक सुगंधित कल्पना को? क्या हम उन मोहों को त्याग सकते हैं, जो हमें रोज़ सँजोते हैं? क्या हम उस विराग को सह सकते हैं, जो हमारी दैनंदिन गृहस्थी को ही माया मान लेगा?
शिव जैसा वर चाहिए। यह बात बहुत-सी स्त्रियाँ कहती हैं। पर यदि सचमुच शिव जैसा कोई पुरुष उनके जीवन में आ जाए, वैराग्य में डूबा हुआ, जटाजूटधारी, भस्म रमाए, संसार के मोह-माया से परे, सब कुछ त्याग देने वाला... तो क्या वे उससे प्रेम कर पाएँगी?
शायद नहीं। क्योंकि स्त्री मन तो प्रेम चाहता है, त्याग नहीं।
साथ चाहता है, मौन नहीं। उपस्थिति चाहता है, दूरी नहीं।
और शिव तो दूरी हैं। वे मौन हैं। वे त्याग हैं। वे प्रेम नहीं हैं।
इसीलिए शिव-सा वर माँगना सरल है। शिव-सा जीवन पाना कठिन। क्योंकि कल्पना में शिव पुष्प हैं। पर यथार्थ में वे राख भी हैं। भस्म भी हैं। श्मशान की नीरवता भी हैं।
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