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Ramdhari Singh Dinkar :रश्मिरथी- सप्तम सर्ग से वह अंश जिसमें कर्ण सेनापति बनता है

                
                                                         
                            घटोत्कच वध के बाद द्रोणाचार्य का निधन हुआ। द्रोणाचार्य के बाद कौरव सेना का सेनापति कर्ण बना। कर्ण विपरीत परिस्थितियों में लड़ा। कवच-कुण्डल तो पहले ही इन्द्र को दे चुका था। इन्द्र से एकघ्नी नामक जो अस्त्र उसे मिला था, वह भी घटोत्कच को मारकर उसके पास से चला गया। फिर कुन्ती को उसने वचन दिया था कि अर्जुन के सिवा और पाण्डवों का वध मैं नहीं करूँगा। इस पर, शल्य को उसने सारथी बनाया। यह रश्मिरथी का अंतिम यानि सातवां खण्ड है जिसमें कर्ण की बातें हैं, उसका युद्ध है और लड़ते हुए उसका वीरगति को प्राप्त होना, जो भाग प्रस्तुत किया जा रहा है उसमें युद्ध में जाने से पहले की कर्ण की बातें हैं, वह क्या और कैसे सोचता है और क्या कहता है-
                                                                 
                            

महाभारत मही पर चल रहा है,
भुवन का भाग्य रण में जल रहा है।
मनुज ललकारता फिरता मनुज को,
मनुज ही मारता फिरता मनुज को ।

पुरुष की बुद्धि गौरव खो चुकी है,
सहेली सर्पिणी की हो चुकी है,
न छोड़ेगी किसी अपकर्म को वह,
निगल ही जायगी सद्धर्म को वह ।

मरे अभिमन्यु अथवा भीष्म टूटें,
पिता के प्राण सुत के साथ छूटें,
मचे घनघोर हाहाकार जग में,
भरे वैधव्य की चीत्कार जग में,

मगर, पत्थर हुआ मानव- हृदय है,
फ़क़त, वह खोजता अपनी विजय है,
नहीं ऊपर उसे यदि पायगा वह,
पतन के गर्त में भी जायगा वह ।
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एक वर्ष पहले

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