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राजेश जोशी के लिए कविता शाब्दिक विलास नहीं, औजार है जिससे वह काट-छाँट डालना चाहते हैं दमन, शोषण और अन्याय

साहित्य
                
                                                         
                            दरवाजे से बाहर जाने से पहले
                                                                 
                            
अपने जूते के तस्मे बाँधने के लिए
मैं झुकता हूँ
रोटी का कौर तोड़ने
और खाने के लिए
झुकता हूँ अपनी थाली पर
जैसे जेब से अचानक गिर गई कलम
या सिक्के को उठाने को
झुकता हूँ
झुकता हूँ
लेकिन उस तरह नहीं
जैसे चापलूस की आत्मा झुकती है
किसी शक्तिशाली के सामने
जैसी लज्जित या अपमानित होकर झुकती हैं आँखें
झुकता हूँ
जैसे शब्दों को पढ़ने के लिए
आँखें झुकती है..


 यह स्वाभिमान संपन्न चेहरा है आधुनिक हिंदी कविता के लोकप्रिय जनवादी स्वर श्री राजेश जोशी का। 

18 जुलाई, 1946 को मध्य प्रदेश के नरसिंहगढ़ में जन्मे और अब भोपाल में रह रहे राजेश जोशी ने यूँ तो कहानी, नाटक,  डायरी और पटकथाओं का लेखन भी किया है लेकिन आपकी घनीभूत संवेदना ज़्यादातर कविता में ही आकार पाती रही है। आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

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