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राजेश जोशी के लिए कविता शाब्दिक विलास नहीं, औजार है जिससे वह काट-छाँट डालना चाहते हैं दमन, शोषण और अन्याय

साहित्य
                
                                                         
                            दरवाजे से बाहर जाने से पहले
                                                                 
                            
अपने जूते के तस्मे बाँधने के लिए
मैं झुकता हूँ
रोटी का कौर तोड़ने
और खाने के लिए
झुकता हूँ अपनी थाली पर
जैसे जेब से अचानक गिर गई कलम
या सिक्के को उठाने को
झुकता हूँ
झुकता हूँ
लेकिन उस तरह नहीं
जैसे चापलूस की आत्मा झुकती है
किसी शक्तिशाली के सामने
जैसी लज्जित या अपमानित होकर झुकती हैं आँखें
झुकता हूँ
जैसे शब्दों को पढ़ने के लिए
आँखें झुकती है..


 यह स्वाभिमान संपन्न चेहरा है आधुनिक हिंदी कविता के लोकप्रिय जनवादी स्वर श्री राजेश जोशी का। 

18 जुलाई, 1946 को मध्य प्रदेश के नरसिंहगढ़ में जन्मे और अब भोपाल में रह रहे राजेश जोशी ने यूँ तो कहानी, नाटक,  डायरी और पटकथाओं का लेखन भी किया है लेकिन आपकी घनीभूत संवेदना ज़्यादातर कविता में ही आकार पाती रही है।

'बिजली का मीटर पढ़ने वाले से बातचीत' कविता में वे लिखते हैं:-

 हम लोग एक ऐसे समय के नागरिक हैं 
जिसमें हर दिन महँगी होती जाती है रोशनी 
और बढ़ता जाता है अँधेरे का आयतन लगातार 


एक अन्य कविता में वे लिखते हैं:-

पानी पियो 
तो शुक्रिया अदा करो बादलों का

 पानी पियो तो सोचो 
कि काटी तो नहीं हैं तुमने दूसरों की नहरें

पानी पियो तो सोचो 
खारा तो नहीं हुआ है तुम्हारी आत्मा का जल!!


जिस उम्र में बच्चों को पढ़ना- खेलना चाहिए, उस उम्र में बाल श्रम करने को मजबूर बच्चे संवेदन-शून्य समाज के मुँह पर तमाचा हैं। 
ऐसे बच्चों को देखकर राजेश जोशी ख़ामोश नहीं रह पाते:-

कोहरे से ढकी सड़क पर
बच्चे काम पर जा रहे हैं
सुबह-सुबह
बच्चे काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना
लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह
काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?


विकास के नाम पर हमने धरती की छाती पर बड़े-बड़े शहर तो बना लिए लेकिन उनमें गाँव छोड़कर बसने पहुंचे लोगों के दिल बहुत छोटे हो गए। 
 
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2 वर्ष पहले

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