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बशीर बद्र: उजाले अपनी यादों के...

साहित्य
                
                                                         
                            पिछली सदी की छटी दहाई में जिगर मुरादाबादी साहब जा चुके थे और फिराक़ गोरखपुरी साहब अपनी उम्र और शायरी की आखिरी दहाई की जानिब बढ़ चुके थे। छटी दहाई में हिंदुस्तान में नई ग़ज़ल के चार नाम एक साथ चमकते हैं। चारों ही नाम अपने-अपने रंग के साथ जहां एक तरफ मुशायरों में जगमगाने लगते हैं वही किताब पढ़ने पर भी उस वक़्त के पढ़ने वालों को मजबूर कर देते हैं। ये चार नाम शहरयार, बशीर बद्र, निदा फाज़ली और वसीम बरेलवी थे। अगर मुशायरों की बात की जाए तो इन चारों में जो महबूबियत बशीर बद्र को हासिल हुई, वो बाद में वसीम बरेलवी साहब को ज़रूर हासिल हुई। लेकिन बशीर बद्र की शोहरतें अपने हम असर यानी समकालीन शोअरा तक को हैरान किए हुए थी। 
                                                                 
                            

बशीर बद्र का नाम जब ज़हन में आता है तो सबसे पहले ज़बान को बेइंतिहा आसान कर शेर कहने वाले शाइर का चेहरा नज़र के सामने घूम जाता है। बशीर बद्र ने उर्दू ग़ज़ल को अल्फाज़ की जो आसानी अता की वो उनसे पहले सिर्फ नासिर काज़मी के पास थी। इसके अलावा अंग्रेज़ी ज़बान के वो अल्फाज़ जिन्हें उर्दू ग़ज़ल में क्या उर्दू नसर् में भी इस्तेमाल करने का तसव्वुर नहीं किया जा सकता। उन्होंने किस आसानी के साथ अंग्रेजी के अल्फाज़ को ग़ज़ल का हिस्सा बनाया वो देखने से ताल्लुक़ रखता है। 

वो ज़ाफरानी पुलोवर उसी का हिस्सा है 
कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे 


साइकिल, पेडल और  न जाने कितने अंग्रेजी के अल्फाज़ उनके यहां उर्दू अल्फ़ाज़ में तब्दील हो गए हैं। मुशाइरों में शेर सुनाते हुए अगर कोई ज़रा सा मुश्किल लफ्ज़ आ जाता तो बशीर साहब हाथ जोड़ के सामईन से माफी मांगते हुए कहते कि इस लफ्ज़ का आसान लफ्ज़ इस शेर के मेयार के मुताबिक नहीं मिल पाया इसलिए मजबूर होकर यह लफ्ज़ रखा और फिर लफ्ज़ का मतलब बताकर शेर सुनाते यानी अल्फाज़ की आसानी उनके यहां इस हद तक पहुंची हुई थी कि जिसका तसव्वुर उनके समकालीन शाइर कर भी नहीं सकते थे।  आगे पढ़ें

3 महीने पहले

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