आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जन्मदिन पर विशेष : लॉरेंस ड्युरेल- भारत में जन्मा प्रसिद्ध लेखक

Lawrence Durrell: Famous Indian born author
                
                                                         
                            
द्रुत गति और खूब ऊर्जा के साथ बोलने वाले लॉरेंस जॉर्ज ड्युरेल का जन्म 27 फ़रवरी 1912 को भारत में हुआ था। इस ब्रिटिश उपन्यासकार, कहानीकार, नाटककार, कवि, यात्रा वृतांत लेखक तथा अनुवाद का जन्म जालंधर में हुआ और एक मजेदार बात बताऊँ उसका छोटा भाई जेराल्ड ड्युरेल मेरे शहर यानि जमशेदपुर में जन्मा था। वही जेराल्ड ड्युरेल जिन्होंने ‘माई फ़ैमिली एंड अदर एनिमल्स’, ‘बर्ड्स, बीस्ट्स एंड रेलेटिव्स’ तथा ‘द गार्डन ऑफ़ गॉड’ जैसी किताबें लिखीं और जो अपने कीट-पतंगों तथा पशु-पक्षी प्रेम के लिए जाने जाते हैं। लॉरेंस ड्युरेल की प्रारंभिक शिक्षा भारत में सेंट जोसेफ़’स स्कूल नॉर्थ पॉइंट दार्जलिंग में हुई थी। लॉरेंस सैमुअल ड्युरेल, उनके इंजीनियर पिता ब्रिटिश साम्राज्य के अधिकारी थे और भारत के विभिन्न स्थानों में कार्यरत थे। उनकी माँ का नाम लुइसा फ़्लोरेंस डिक्सी था। अधिकाँश पिता की भाँति उनके पिता मानते थे कि बेटे को इंडियन सिविल सर्वेंट बनना चाहिए। अत: ग्यारह साल की उम्र में उन्हें शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया था।
 
मगर बेटा आठ साल से लिखने की ओर मुड़ चुका था। उसे औपचारिक शिक्षा रास नहीं आती थी। 20 साल की उम्र होते न होते उसकी पहली किताब प्रकाशित हुई। पिता पढ़ने-लिखने के लिए अच्छी खासी रकम भेजते और बेटा उसे नाइट क्लब, फ़ास्ट कार और अन्य तमाम बातों में उड़ा रहा था। लॉरेंस यूनिवर्सिटी की परीक्षा कभी पास न कर पाए। कैंब्रिज के लिए उन्होंने आठ बार कोशिश की और असफ़ल रहे। गणित कभी उनसे न संभला। कैंब्रिज ने भले ही आठ बार प्रयास के बाद उन्हें दाखिला न दिया लेकिन काफ़ी बाद में कैलिफ़ोर्निया इंस्ट्युट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी ने उन्हें ह्युमनिटीज विषय में लेक्चर देने के लिए विजिटिंग प्रोफ़ेसर के रूप में आमंत्रित किया और वे वहाँ कुछ समय शिक्षण करते रहे। पिता के गुजरने के बाद वे लोग कुछ दिन इंग्लैंड में रहे फ़िर 1935 में यूनान के कोर्फ़ु द्वीप में आ गए।

इंग्लैंड में लिखना उन्हें सहज न लगता, इसके लिए वे यूरोप के अन्य देशों में जाते रहे। लिखने के लिए पागल लॉरेंस ड्युरेल को आजीविका के लिए कई पापड़ बेलने पड़े। उन्होंने नाइट क्लब में पियानो बजाया, इस्टेट एजेंट का काम किया जहाँ उन्हें किराया इकट्ठा करना होता था और जहाँ कुत्तों ने उन्हें काट खाया था, जैसे काम करने पड़े। लेकिन लिखना उनका सबसे बड़ा जुनून था। जिस तीव्र गति से वे बोलते थे उसी तीव्र गति से वे लिखते भी थे। लेकिन प्रकाशन के गुर उन्हें न आते थे। शुरु में प्रकाशन में काफ़ी दिक्कतें आईं। बाद में वे बीसवीं सदी के एक बड़े और खूब प्रसिद्ध लेखक बनें। पेरिस रिव्यू पत्रिका के अनुसार लॉरेंस का साक्षात्कार करना एक उपहार की भाँति है क्योंकि वे बेवकूफ़ी भरे प्रश्नों के उत्तर भी बुद्धिमता से देते थे। पेरिस रिव्यू में उनका एक लंबा साक्षात्कार प्रकाशित है।

गद्य लिखना उन्हें आसान लगता है, उसे वे एक बार में लिख लेते हैं लेकिन कविता के लिए मशक्कत करनी पड़ती है वैसे यह दीगर है बाज वक्त वह अनायास चली आती है। वैसे तो वे टाइपराइटर पर लिखते थे पर मानते थे कि वे कविताएँ सर्वोत्तम हैं जिन्हें उन्होंने हाथ से लिखा है। उनका मानना है कविता को पकड़ना छिपकली को बिना उसकी पूछ कटे पकड़ने की तरह है। क्योंकि जब आप छिपकली पकड़ने का प्रयास करते हैं तो वह आपको भरमाने के लिए अपनी पूँछ काट कर फ़ेंक देती है। उन्हें अनोखा लगा जब उन्हें पता चला कि जॉर्ज बार्कर उनसे टाइपराइटर माँग कर कविताएँ लिखते हैं, पहले वो सोचते थे बार्कर अपने लोगों को खत लिखने के लिए उनसे टाइपराइटर माँगते थे। कविता संग्रहों, चुनी हुई कविताओं के संग्रह के अलावा ‘टेन पोएम्स’, ‘ए प्राइवेट कंट्री’, ‘ऑन सीमिंग टू प्रिज्यूम सिटीज, प्लेन्स एंड पीपुल’ आदि लॉरेंस ड्युरेल की काव्य पुस्तकें हैं।

लॉरेंस ड्युरेल ने विभिन्न नामों तथा बिना नाम के भी खूब लेखन किया। एक दिन में वे दस पन्ने लिख सकते थे। इसीलिए कहानी उनसे नहीं सधती थी जबकि वे ओ. हेनरी की खूब प्रशंसा करते हैं। उन्हें चालीस पन्ने लिखना सरल लगता था। उनके लिए ‘टाइम्स’ का कॉलम लिखना भी मुश्किल काम होता था क्योंकि वे 1000 शब्द चाहते थे जो लॉरेंस के लिए कठिन काम था अत: वे पाँच-आठ हजार शब्द लिख कर भेज देते और उन लोगों को मनमर्जी से उसकी काट-छाँट करने की अनुमति भी दे देते। विदेश सेवा में सीनियर प्रेस ऑफ़ीसर थे इस पद पर रहते हुए उन्होंने तमाम पत्राचार किए। यहाँ काम करते हुए उन्होंने संक्षिप्तता तथा डेडलाइन के दबाव पर काम करना सीखा। वे सफ़लता-असफ़लता में भाग्य को एक प्रमुख तत्व को मानते हैं। मजेदार बात यह है कि जिसके काम को इतने चाव से पढ़ा जाता है, वह खुद अपने काम को बिल्कुल पसंद नहीं करता है, दोबारा पढ़ना नहीं चाहता है। प्रूफ़ देखने के समय उसे मितली आती है और सिरदर्द के लिए वह दवा खाता है। एक बार लिखने के बाद वह उसे दोबारा देखना पसंद नहीं करता है।

वे अपने लेखन में बार-बार समान चरित्रों का प्रयोग करते हैं अत: उनके एक आलोचक के अनुसार, ड्युरेल अपने लेखन में कभी सही विभेद नहीं करते हैं, उनके लिखे में वास्तविक और काल्पनिक लोगों में कोई अंतर नहीं होता है। वैसे ड्युरेल का मानना है कि उसका लेखन आत्मकथात्मक नहीं है और न ही वे वास्तविक लोगों को अपने लेखन में लाते हैं। वे चित्रकार भी हैं मगर खुद को बहुत बुरा और भोथरा चित्रकार मानते हैं। आलोचकों की ओर ध्यान न देने वाले इस लेखक का मानना है यदि वे आलोचकों की बात पर कान धरने लगें तो उनका लिखना रुक जाएगा। वे मानते हैं कि अच्छी-बुरी दोनों तरह की आलोचना लेखन में बाधा डालती है, कम-से-कम दो दिन काम रुक जाता है। और चूँकि वे आजीविका के लिए लिखने पर ही निर्भर हैं, अत: इस तरह का खतरा मोल नहीं ले सकते हैं।
आगे पढ़ें

4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर