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2021 के करोना काल में हिन्दी साहित्य

Hindi literature in the Corona period of 2021
                
                                                         
                            
जीवन में उथल-पुथल लगी रहती है। कभी मनुष्य चाँद पर पहुँच जाता है तो कभी महामारी की चपेट में आ जाता है। सन् 2020 का पूरा साल कोरोना के काल के गाल में समा गया। पूरी दुनिया लॉकडाउन हो गई। 2021 की आशा में सब बैठे थे मगर तब तक कोरोना की दूसरी लहर आई और बहुत कुछ निगल गई। चारो ओर सन्नाटा छा गया। मगर मनुष्य की जिजीविषा बहुत शक्तिशाली होती है। वह इस कुकाल में भी जीवित रही। जिजीविषा को एक बड़ा सहारा साहित्य से मिलता है। साहित्य हमें राह दिखाता है। 2021 में जब पत्रिकाएँ लगभग बंद थीं, प्रिंटिंग व्यवसाय दम तोड़ गया था, अखबारों की बिक्री-विज्ञापन मृतप्राय: था। ऐसे समय में साहित्य ने अपने लिए नए-नए रास्ते निकाले। साहित्य में नए अंकुर फ़ूटे, नई शाखाएँ विकसित हुईं। नए माध्यम सामने आए।
 
अब 2021 का साल समाप्त हो रहा है ऐसे में जब हम पूरे साल के साहित्यिक परिदृश्य पर नजर डालते हैं, उसका मूल्यांकन करते हैं तो पाते हैं कि हमने इस साल काफ़ी कुछ खोया है, साथ ही बहुत कुछ पाया है। इस बीच साहित्य हमें बराबर कोरोना से लड़ने की ताकत देता रहा। तकनीकि ने भी हमारा भरपूर साथ दिया। इस साल प्रिंट मीडिया की अनुपस्थिति में इलैक्ट्रोनिक मीडिया खूब सक्रिय रहा। सोशल मीडिया की बदौलत हम घरों में बंद रहने के बावजूद एक-दूसरे से जुड़े रहे, एक-दूसरे को हिम्मत बँधाते रहे, एक-दूसरे को ढ़ाढ़स देते रहे। फ़ेसबुक पर खूब हलचल रही। वहाँ कविताओं-कहानियों में अपने दु:ख-सुख व्यक्त किए गए। प्रेरक प्रसंग उकेरे गए। स्ट्रीमयार्ड की सहायता से खूब लाइव प्रोग्राम हुए।

लॉकडाउन के कारण साहित्यिक समारोह-सेमीनार चाह कर भी करना संभव न था, इसे संभव बनाया गूगल मीट और ज़ूम, फ़ेसबुक लाइव, व्हाट्सएप, ट्विटर, इंस्टाग्राम, ई-मेल ने। इससे लाभ हुआ अब हर साहित्यिक कार्यक्रम लोकल के स्थान पर ग्लोबल होने लगा। हम स्थानीय और वैश्विक दोनों एक साथ हो गए। घर बैठे लोग देश-विदेश से जुड़ने लगे काव्य चर्चा, काव्य गोष्ठियों, कथा पाठ, रचनाकार से मिलना-जुलना, पुस्तक समीक्षाएँ, विचार-विमर्श आम बात हो गए। अब स्कूल, कॉलेज, साहित्यिक संस्थाएँ सब आए दिन प्रोग्राम करने लगीं, एक दिन में कई वेबीनार में शामिल होना संभव होने लगा। राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ ने अपना वार्षिक साहित्यिक समारोह मनाया और मुझे भोपाल, रूस, अमेरिका के साहित्यिक मित्रों से घर बैठे विचार-विमर्श का अवसर प्राप्त हुआ। यह वर्ष फ़णिश्वरनाथ रेणु का शताब्दी वर्ष था। फ़ेसबुक पर ‘स्त्री दर्पण’ ने रेणु पर कई नायाब कार्यक्रम आयोजित किए। वीडिओ टॉक, यू-ट्यूब पर साहित्य छा गया। कम्प्युटर, मोबाइल सब पर साहित्य रचना, प्रचारित, प्रसारित करना पहले भी था, अब उसका महत्व और उपयोग कई गुणा बढ़ गया। इस तरह साहित्य का क्षेत्र विस्तार पा गया। आगे पढ़ें

4 वर्ष पहले

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