और फिर श्रद्धा का यह कोई दौर है देश में? जैसा वातावरण है, उसमें किसी को भी श्रद्धा रखने में संकोच होगा। श्रद्धा पुराने अखबार की तरह रद्दी में बिक रही है। विश्वास की फसल को तुषार मार गया। इतिहास में शायद कभी किसी जाति को इस तरह श्रद्धा और विश्वास से हीन नहीं किया गया होगा।
जिस नेतृत्व पर श्रद्धा थी, उसे नंगा किया जा रहा है। जो नया नेतृत्व आया है, वह उतावली में अपने कपड़े ख़ुद उतार रहा है। कुछ नेता तो अंडरवियर में ही हैं। कानून से विश्वास गया। अदालत से विश्वास छीन लिया गया। बुद्धिजीवियों की नस्ल पर ही शंका की जा रही है। डॉक्टरों को बीमारी पैदा करने वाला सिद्ध किया जा रहा है। कहीं कोई श्रद्धा नहीं, विश्वास नहीं।
अपने श्रद्धालुओं से कहना चाहता हूँ- 'यह चरण छूने का मौसम नहीं, लात मारने का मौसम है। मारो एक लात और क्रांतिकारी बन जाओ'..
यह विचारोत्तेजक अंश जाने-माने व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई द्वारा लिखे गए व्यंग्यपरक निबंध-संग्रह 'विकलांग श्रद्धा का दौर' से लिए गए हैं।
वर्ष 1995 में आज ही के दिन 10 अगस्त को मात्र 72 वर्ष की उम्र में आपका निधन हो गया था। अंतिम साँस लेने से पूर्व परसाई जी व्यक्ति, समाज और देश के चरित्र को सुधारने के लिए इसी तरह व्यंग्य को हथियार बनाकर अपनी कलम से आजीवन प्रहार करते रहे। आओ! आज उन्हें याद करें। उनके लेखन से संवाद करें..
आपातकाल में दिखी विकलांग श्रद्धा..
वर्ष 1975 में देश में आपातकाल लगाया गया। इस दौरान राजनीतिक उथल-पुथल चरम पर थी। इस उथल-पुथल को एक वर्ष बीतते बीतते वर्ष-1976 में परसाई जी की टाँग टूट गई। राजनीतिक विकलांगता के साथ शारीरिक विकलांगता के योग से उनके जीवन में जो आपातकाल लगा, उसके परिणाम स्वरूप जिस कृति का उदय हुआ, उसका नाम था 'विकलांग श्रद्धा का दौर'..
इस कृति में वर्ष 1975 से 1979 की अवधि के दौरान लिखे गए व्यंग्यपरक निबंधों का संग्रह किया गया। वर्ष 1982 में इस पुस्तक को साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया
परसाई जी लिखते हैं:-
जानता हूँ, देश में जो मौसम चल रहा है, उसमें श्रद्धा की टाँग टूट चुकी है। तभी मुझे भी यह विकलांग श्रद्धा दी जा रही है। लोग सोचते होंगे- इसकी टाँग टूट गई है। यह असमर्थ हो गया। दयनीय है। आओ, इसे हम श्रद्धा दे दें।
'विकलांग श्रद्धा का दौर' में ही एक जगह परसाई जी लिखते हैं:-
मेरे ही शहर के कॉलेज में एक अध्यापक थे। उन्होंने अपने नेम-प्लेट पर ख़ुद ही 'आचार्य' लिखवा लिया था। मैं तभी समझ गया था कि इस फूहड़पन में महानता के लक्षण हैं। आचार्य बंबईवासी हुए और वहाँ उन्होंने अपने को 'भगवान रजनीश' बना डाला। आजकल वह फ़ूहड़ से शुरू करके मान्यता प्राप्त भगवान हैं। मैं भी अगर नेम-प्लेट में नाम के आगे 'पंडित' लिखवा लेता तो कभी का 'पंडित जी' कहलाने लगता।
आचार्य-कृपा से मिलती है डॉक्टरेट
इसी ग्रंथ में शिक्षा और शोध-कार्यों की बदतर स्थिति पर परसाई जी कटाक्ष करते हुए लिखते हैं:-
डॉक्टरेट अध्ययन और ज्ञान से नहीं, आचार्य-कृपा से मिलती है। आचार्य की कृपा से इतने डॉक्टर हो गए हैं कि बच्चे खेल-खेल में पत्थर फेंकते हैं तो किसी डॉक्टर को लगता है। एक बार चौराहे पर यहाँ पथराव हो गया। पाँच घायल अस्पताल में भर्ती हुए और वे पाँचों हिंदी के डॉक्टर थे। नर्स अपने अस्पताल के डॉक्टर को पुकारती: 'डॉक्टर साहब!' तो बोल पड़ते थे ये हिंदी के डॉक्टर।
मित्र की 'कामुकता' पर ली चुटकी
मेरे एक मित्र बीमार पड़े थे। जैसे ही कोई स्त्री उन्हें देखने आती, वह सर पकड़कर कराहने लगते। कहते- दर्द के मारे सर फटा जा रहा है। स्त्री सहज ही उनका सर दबा देती। उनकी पत्नी ने ताड़ लिया। कहने लगी- क्यों जी! जब कोई स्त्री तुम्हें देखने आती है, तभी तुम्हारा सिर क्यों दुखने लगता है। उसने ज़वाब भी माकूल दिया। कहा- "तुम्हारे प्रति मेरी इतनी निष्ठा है कि पर स्त्री को देखकर मेरा सिर दुखने लगता है। जान प्रीत-रस इतनेहु माहीं।"
वयोवृद्धों को भी नहीं छोड़ा
लोग कहते हैं, ये वयोवृद्ध हैं और चरण छू लेते हैं। वे अगर कमीने हुए तो उनके कमीनेपन की उम्र भी 60-70 साल हुई। लोग वयोवृद्ध कमीनेपन के भी चरण छू लेते हैं। मेरा कमीनापन अभी श्रद्धा के लायक नहीं हुआ है।
व्यंग्य करने के लिए ख़ुद को भी बनाते थे पात्र
आप शुरू से इस आलेख को निरंतर पढ़ते हुए देख ही रहे हैं कि हरिशंकर परसाई जी व्यक्तियों और विसंगतियों पर व्यंग्य करने के लिए स्वयं को भी उसका हिस्सा बनाते रहते थे। 'विकलांग श्रद्धा का दौर' पुस्तक से इसी तरह का एक और उदाहरण पढ़ने लायक है। वे लिखते हैं:-
अभी-अभी एक आदमी मेरे चरण छूकर गया है। मैं बड़ी तेजी से श्रद्धेय हो रहा हूँ। जैसे कोई चलतू औरत शादी के बाद बड़ी फुर्ती से पतिव्रता होने लगती है।
परसाई जी लिखते हैं:-
चंदा माँगने वाले और देने वाले एक दूसरे के शरीर की गंध बखूबी पहचानते हैं। लेने वाला गंध से जान लेता है कि यह देगा कि नहीं। देने वाला भी माँगने वाले के शरीर की गंध से समझ लेता है कि यह बिना लिए टल जाएगा कि नहीं।
वे यहीं नहीं रुकते। कहते हैं:-
रोटी खाने से ही कोई मोटा नहीं होता, चंदा या घूस खाने से होता है। बेईमानी के पैसे में ही पौष्टिक तत्व बचे हैं।
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आपातकाल में दिखी विकलांग श्रद्धा..
2 वर्ष पहले
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