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हरिशंकर परसाई: विसंगतियों पर तंज करने के लिए स्वयं को भी उसका हिस्सा बनाते रहते थे

साहित्य
                
                                                         
                            और फिर श्रद्धा का यह कोई दौर है देश में? जैसा वातावरण है, उसमें किसी को भी श्रद्धा रखने में संकोच होगा। श्रद्धा पुराने अखबार की तरह रद्दी में बिक रही है। विश्वास की फसल को तुषार मार गया। इतिहास में शायद कभी किसी जाति को इस तरह श्रद्धा और विश्वास से हीन नहीं किया गया होगा।
                                                                 
                            

जिस नेतृत्व पर श्रद्धा थी, उसे नंगा किया जा रहा है। जो नया नेतृत्व आया है, वह उतावली में अपने कपड़े ख़ुद उतार रहा है। कुछ नेता तो अंडरवियर में ही हैं। कानून से विश्वास गया। अदालत से विश्वास छीन लिया गया। बुद्धिजीवियों की नस्ल पर ही शंका की जा रही है। डॉक्टरों को बीमारी पैदा करने वाला सिद्ध किया जा रहा है। कहीं कोई श्रद्धा नहीं, विश्वास नहीं। 

 अपने श्रद्धालुओं से कहना चाहता हूँ- 'यह चरण छूने का मौसम नहीं, लात मारने का मौसम है। मारो एक लात और क्रांतिकारी बन जाओ'.. 

 यह विचारोत्तेजक अंश जाने-माने व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई द्वारा लिखे गए व्यंग्यपरक निबंध-संग्रह 'विकलांग श्रद्धा का दौर' से लिए गए हैं। 

वर्ष 1995 में आज ही के दिन 10 अगस्त को मात्र 72 वर्ष की उम्र में आपका निधन हो गया था। अंतिम साँस लेने से पूर्व परसाई जी व्यक्ति, समाज और देश के चरित्र को सुधारने के लिए इसी तरह व्यंग्य को हथियार बनाकर अपनी कलम से आजीवन प्रहार करते रहे। आओ! आज उन्हें याद करें। उनके लेखन से संवाद करें.. आगे पढ़ें

आपातकाल में दिखी विकलांग श्रद्धा..

2 वर्ष पहले

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