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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का रूमानी ख़त अपनी पत्नी के नाम

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"आज तुम्हारा ख़त मिला, बड़ी राहत हुई। आज हमारी शादी की सालगिरह है। दुआ है कि तुम्हें (बल्कि हमें) ये दिन कई बार देखना नसीब हों। इन दस बरस में बहुत सा सुख देखा है और थोड़ा सा दुख भी लेकिन हमने ये तमाम दिन दयानतदारी, सुकूने-ख़ातिर से गुज़ारे हैं और ज़िन्दगी में सबसे अहम बात यही है। तो आओ उन बीते हुए दिनों का शुक्राना अदा करें। ये दस बरस ऐसी दौलत हैं जिसे कभी फ़ना नहीं और जिसे कोई छीन नहीं सकता। अगर किसी को उक़बा (परलोक) या आसमानी एहकामात (ईश्वरीय आदेश) पर ईमान न हो तो नेकी और अख़लाक़ (सदाचरण) के हक़ में सबसे बड़ी दलील यही है कि जो लम्हा हक़-ओ-सदाक़त की परवरिश में गुज़रे वह बजाय खुद-ख़ुशी का ऐसा ख़जाना बन जाता है जिसे कोई रहजन लूट नहीं सकता, न कोई जाबिर (आततायी) ज़ब्त कर सकता है।

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4 वर्ष पहले

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