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जब मंटो ने सारे शायरों को इकट्ठा किया और कहा कि "आप लोग..."

सआदत हसन मंटो
                
                                                                                 
                            

बकौल नदीम,



मंटो को एक अजीब शरारत सूझी। उसने सब शायरों को जमा करके कहा- "आप लोग एक-एक ऐसी नज़्म लिखें जो न उर्दू में हो, न हिन्दी में, बल्कि किसी भी ज़बान में न हो। आप लोगों के लफ़्ज़ों को गाने के ढंग से ही सुनने वाले अंदाज़ा लगा लेंगे कि यह फ़ैज़ की नज़्म है और यह राशिद की और यह उपेन्द्रनाथ अश्क की। सब तो नहीं अलबत्ता फ़ैज़ साहब ने, अश्क ने और राशिद ने भी बेमानी अल्फ़ाज़ की नज्में कहीं। एक नज़्म मैंने भी गढ़ी। उन्वान था 'भौंरा'... और भौंरे के परों की आवाज़ के अल्फ़ाज़ गढ़ कर छह-सात अशआर की नज़्म लिख डाली। फिर उन नज़्मों की रिकॉर्डिंग का मरहला आया। सब ने अपनी नज़्में रिकॉर्ड कराई मगर फ़ैज़ साहब जब भी रिकॉर्डिंग के लिए स्टूडियो में दाखिल हुए, बेतहाशा हँसते हुए बाहर भाग लिए। इन की हँसी रुकती ही नहीं थी। कहते थे, मंटो ने हम सब को फूल बनाया है और मंटो पुकारता रहा कि मैं इस प्रोगाम को करके उर्दू-हिन्दी का झगड़ा करने वालों को फूल बनाऊँगा। आख़िरकार फ़ैज़ अपनी बेमायनी नज़्म रिकॉर्ड कराने में कामयाब हो गए। मैंने बाद में सुना कि ये नज़्में दिल्ली रेडियो स्टेशन से नस्र (प्रसारित) हुईं तो बाबाए-उर्दू मौलवी अब्दुल हक़ साहब ने सुनीं और कोई ग़लत असर लेने के बजाय बेहद प्रसन्न हुए।

नदीम के इस बयान से ज़ाहिर है कि शरारती लहजे में भी मंटो जो कहते या कार्यक्रम सुझाते, उसे सीधे-सीधे टालना या इनकार करना मुश्किल हो जाता। यह बात महज लहजे की नहीं थी, लहजे में छिपे हुए भेद की होती थी जैसे उर्दू-हिन्दी का भाषागत झगड़ा, जिसे हल्के-फुल्के ढंग में पेश करके उस की हँसी उड़ाई जा सके।

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10 months ago

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