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मंच सूना हो गया, पर उनके गीत हमेशा जिंदा रहेंगे

गोपाल दास नीरज
                
                                                         
                            ‘चाहे चिर गायन सो जाए,
                                                                 
                            
और हृदय मुर्दा हो जाए,
किन्तु मुझे जब गाना ही है-
बैठ चिता की छाती पर भी,

मादक गीत सुना लूँगा मैं।
हार न अपनी मानूँगा मैं!’


बेशक नीरज जी ने वक्त से कभी हार नहीं मानी। अंतिम समय तक सक्रिय रहे। लेकिन आखिरकार उम्मीदों और रुमानियत से भरे इस महान गीतकार, कवि, शायर और एक बेहतरीन संजीदे इंसान ने ज़िंदगी से हार मान ही ली।

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से

जाड़े की गुनगुनी धूप और गरमी की शाम में अलीगढ़ के अपने मकान के बरामदे में बिस्तर पर लेटे लेटे अपना ज्यादातर वक्त गुज़ारने वाले नीरज जी अक्सर अपना यही गीत गुनगुनाते थे –

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।


देवानंद और राजकपूर की बेहद इज्जत करने वाले, उन्हें सबसे समझदार और शानदार फिल्मकार बताने वाले नीरज जी के लिए उनका यादगार गीत भी हमेशा उनका साथ देता था – ‘दिल आज शायर है, ग़म आज नग़मा है।‘ इसी गीत को उन्होंने अपने फोन की कॉलर ट्यून भी बना रखा था। 
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स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से

8 वर्ष पहले

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