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मैं साहिर की अधजली सिगरेट इकट्ठा करती...

raseedi ticket: love between amrita pritam and sahir ludhianvi
                
                                                         
                            
अमृता प्रीतम की जिंदगी उलझी हुई रही है। खुद अमृता अपनी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' में इसकी तस्दीक करती हैं। अमृता शादीशुदा थीं और शादी के बहुत सालों बाद उन्हें साहिर से प्यार हुआ था। वो साहिर से कैसे मिली थीं ये किस्सा बहुत चर्चाओं में रहा है। ये एक मुशायरा की रात थी, जिसकी अगली सुबह बरसात भी हुई थी। किस्सा 1944 का है, अमृता ने एक ऐसे मुशायरे में शिरकत की थी जहां साहिर बतौर शायर मौजूद थे। पहली बार अमृता की नज़र साहिर लुधियानवी से वहीं मिली। 

हालांकि अमृता साहिर की शख़्सियत से पहले से ही वाक़िफ थीं लेकिन आमना-सामना पहली बार हुआ था। पहली मुलाकात में ही अमृता अपने दिल को साहिर की तरफ जाने से ना रोक पायीं। इसको लेकर अमृता ने लिखा है कि "मुझे नहीं मालूम कि साहिर के लफ्जों की जादूगरी थी या कि उनकी खामोश नज़र का कमाल था जिसने मुझे उनकी तरफ़ खींच लिया"। 

मुशायरे की वो रात खत्म हुई तो लोग अगले दिन लोपोकी शहर जाने के लिए एक-दूजे को खुदा हाफिज करने लगे। लोपोकी शहर से वापस लाहौर तक जाने के लिए बस का इंतज़ाम भी था। बीती रात बारिश होने से सुबह की फिज़ा में एक नमी भी थी। लोपो‌की की ओर जाने वाले रास्ते पर बारिश की वजह से थोड़ी फिसलन हो गई थी। किसी तरह हम मंजिल तक पहुंचे। वहां मुशायरा जब ख़त्म हुआ तब तक मौसम ने फिर से करवट बदली और हल्की रिमझिम बारिश शुरू हो गई। 

उस रात की बात को याद करते हुए अमृता ने लिखा कि "आज जब उस रात को मुड़कर देखती हूं तो ऐसा समझ आया है कि तक़दीर ने मेरे दिल में इश्क़ का बीज डाला, जिसे बारिश की फुहारों ने बढ़ा दिया" कुछ इस तरह अमृता और साहिर के बीच मोहब्बत बढ़ती गई।

 'रसीदी टिकट' में अपनी मोहब्बत का ज़िक्र करते हुए उन्होंने लिखा कि "जब साहिर मुझसे मिलने लाहौर आते तो हमारे दरम्यान रिश्तों का विस्तार बन जाता। मेरी खामोशी का फैलाव हो जाता। मानो ऐसे जैसे मेरी बगल वाली कुर्सी पर आकर वो चुपचाप चले  गए हो। वो आहिस्ता से सिगरेट जलाते, थोड़ा कश लेकर उसे आधी छोड़  देते। जली सिगरेट को बीच में छोड़ देने की आदत सी थी साहिर में। अधजली सिगरेट को रखकर नयी जला लेते थे। जैसे हमेशा कुछ बेहतर तलाश रहे हों। 

साहिर की अधूरी सिगरेट को संभाल कर रखना सीख लिया था मैंने। अकेलेपन में यही मेरी साथी थी। उन्हें उंगलियों में थामना मानो साहिर का हाथ थामना था। उनकी छुअन को महसूस करना था...सिगरेट की लत मुझे ऐसे ही लगी। साहिर ने मुझसे बहुत बाद में अपने इश्क़ का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वो मेरे घर के पास घंटों खड़े  रहकर खिड़की खुलने का इंतज़ार करते थे। घर के नुक्कड़ पर आकर पान खरीदते, सिगरेट सुलगाते या फिर हाथ में सोडे का गिलास ले लेते। 

फिर बंटवारे के बाद साहिर बम्बई के होकर रह गये और अमृता दिल्ली की। दोनों के बीच फिर भी प्यार एक-दूसरे को भेजे ख़तों में महूसस किया जा सकता था। हालांकि यह रिश्ता एक समय के बाद धीमे धीमे खत्म होता गया...

(अमृता प्रीतम की आत्‍मकथा रसीदी टिकट का अंश) 



 
9 वर्ष पहले

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