मैं कोकराझार (असम) के टेंगापाड़ा में पैदा हुई और मैं कोकराझार गवर्नमेंट कॉलेज में भौतिकी पढ़ाती हूं। भौतिकी और साहित्य के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। लेकिन बचपन से ही विज्ञान के साथ-साथ कविताओं में मेरी रुचि थी। हालांकि मैं यह नहीं जानती थी कि एक कवयित्री के तौर पर मुझे इतनी सफलता मिलेगी। पूर्वोत्तर के दूसरे साहित्यकारों की तरह मेरी कविताओं में भी हमारी पहचान के प्रति उपेक्षा और भूगोल के साथ अन्याय के खिलाफ क्षोभ है। इस कारण इस पूरे क्षेत्र में व्यापक हिंसा फैली, जिसने हमारी मनमोहक प्रकृति को नजरों से ओझल कर दिया। बोडो जनजाति पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा जनजातीय समूह है, जिसकी आबादी बीस लाख से अधिक है।
लेकिन हमारे समाज से अब तक राजनीति में सिर्फ दो ही महिलाएं आ पाई हैं, जो एक बड़ी विडंबना है। पूर्वोत्तर की महिलाओं के बारे में छवि यह है कि वे स्वतंत्र फैसले लेती हैं। पर हम बोडो महिलाएं अपनी पहचान के संकट से गुजर रही हैं। पूर्वोत्तर के उपेक्षित, रक्तरंजित वर्तमान के अलावा महिलाओं की बदतर स्थिति भी मेरी कविताओं का विषय है। अपने कविता संग्रह आंग माबोरोई दोंग दसोंग (मत पूछो कि मैं कैसी हूं) के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिलने पर मुझे कितनी खुशी हुई, यह मैं नहीं बता सकती। मुझे मिला यह पुरस्कार अनेक अनाम साहित्यकारों को प्रोत्साहित करेगा। हालांकि मैं यह भी कहना चाहती हूं कि साहित्यकार पुरस्कार पाने के लिए नहीं लिखता।
- साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त बोडो कवयित्री
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