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पाश

मुड़ मुड़ के देखता हूं

धूमिल को लोहे का ‘स्वाद’ मालूम था, पाश ने लोहा ‘खाया’ था - नामवर सिंह

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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स्पेन के लोककवि लोर्का की हत्या के बारे में कहा जाता है कि जब उसकी अमर कविता ‘एक बुलफाइटर की मौत पर शोकगीत’ का टेप जनरल फ़्रैंको को सुनाया गया तो जनरल ने आदेश दिया कि यह आवाज़ बंद होनी चाहिए। यह घटना लगभग 50 साल पहले की है। कविता पर- फिर वह शोकगीत ही क्यों न हो, फ़ासिस्ट प्रतिक्रिया।
पाश के रूप मे पंजाब को भी एक लोर्का मिला था।

यह कहना है प्रसिद्ध आलोचक और साहित्यकार नामवर सिंह का, राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किताब ‘बीच का रास्ता नहीं होता’ की भूमिका में वह लिखते हैं कि “पाश उन थोड़े कवियों में से एक हैं जिन्हें लोहे का गहरा एहसास है जैसा कि ‘लोहा’ शीर्षक कविता कहती है-

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सरापा कवि

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