वह बस में रोज़ मिलती और अचानक एक दिन मेरे घर आ गई...

Ghalib Chhuti Sharab: Mohan Rakesh's wife meeting with ravindra kalia
                
                                                             
                            
प्रसिद्ध साहित्यकार रवींद्र कालिया ने अपने जीवन के संस्मरण में कई रोचक किस्सों का वर्णन किया है। उनके जीवन के अनछुए पहलुओं को उजागर करने वाले एक संस्मरण में वह अपनी एक बस यात्रा और उसके बाद के परिणाम का वर्णन करते हैं। 

बकौल रवींद्र कालिया मैं बस से दफ्तर आता जाता था तो एक युवती रोज़ मझे उसी बस में मिलती थी, कभी-कभी मैं उसके लिए सीट भी छोड़ देता। मुझे नहीं पता था कि वह मोहन राकेश की पत्नी है। लेकिन एक दिन जब वो मेरे घर आ गई तो सहसा मुझे विश्वास न हुआ, लगा कोई सपना देख रहा हूं। ग़ालिब छुटी शराब में बस से दफ़्तर जाने का ज़िक्र करते हुए वह लिखते हैं कि एक दुनिया बस के भीतर होती थी और एक बाहर। जिस दिन खिड़की वाली सीट न मिलती थी, बस के भीतर की दुनिया से परिचय हो जाता था। 

नौजवान यात्री सबसे पहले महिला यात्रियों का जायज़ा लेता है। कोई ख़ूबसूरत चेहरा दिख गया तो यात्रा सफ़ल हो जाती थी। किंग्जवे कैंप से एक लड़की रोज़ बस पकड़ती थी। कहां जाती थी, नहीं मालूम। मैं दरियागंज उतरता तो उसे सीट मिल जाती। वह एक ख़ुशनुमा चेहरा था। उसके बालों पर अक्सर स्कार्फ बंधा रहता, जिससे उसका चेहरा और खिल जाता। वह एक ऐसा चेहरा था, जो आपको याद रह जाए। ऐसी लड़कियों के बारे में यही सोचा जा सकता था कि वह आपके पहलू में बैठ जाए तो कितना अच्छा हो। मुझे प्रायः ऐसा मनहूस सहयात्री नसीब होता था जो दरियागंज से भी आगे जाता था। 

वह लड़की सटकर हमारी सीट के पास खड़ी हो जाती। वह क्या करती है, कहां जाती है, मुझे मालूम नहीं था, मगर इतना मालूम हो चुका था, उसके पास कई स्कार्फ है। जिस दिन वह दिखाई न पड़ती तो बस यात्रा नीरस हो जाती। दो एक बार ऐसा भी हुआ कि वह क़तार में लगी है मगर उसे जगह न मिली। मुझे बहुत अफ़सोस होता और मैं सोचता कि यह बेवक़ूफ़ लड़की वक़्त पर घर से क्यों नहीं निकलती। एक दिन बस ने ऐसा झटका लिया कि वह लड़की गिरते-गिरते बची। मैं खड़ा हो गया और उसे अपनी सीट पेश कर दी। मुझे दफ़्तर में बैठे-बैठे सरकारी कुर्सी ही तोड़नी थी।

स्कार्फ वाली महिला ने कृतज्ञता से मेरी तरफ़ देखा और मेरी सीट पर बैठ गई। उसका चेहरा एकदम तनाव से मुक्त हो गया। मैंने सोचा यह छोटी सी ख़ुशी तो मैं इस महिला को रोज़ दे सकता हूं। मेरी समस्या का भी निदान हो जाएगा, दिन भर दफ़्तर में बैठे-बैठे टांगें अकड़ जाती थीं। स्कार्फ वाली महिला के उदास और क्लांत चेहरे को देखकर मैं अक्सर अपनी सीट से उठ जाता।

एक दिन सुबह-सुबह स्कार्फ वाली महिला मेरे घर पर चली आई। जाड़े के दिन थे। सुबह-सुबह चाय का भी कोई इंतज़ाम न था। छुट्टी के रोज़ तो मैं बी ब्लॉक में ही सत सोनी अथवा कृष्ण भाटिया के यहां चाय पी आता, दफ़्तर वाले दिन यह संभव नहीं था। प्रायः पहला कप मैं दफ़्तर जाकर ही पीता। मकान मालिक कुछ इस अंदाज़ से आकाशवाणी के समाचार सुनता कि लगता कोई मुनादी हो रही है। अभी समाचारों का प्रसारण शुरू नहीं हुआ था कि मेरे कमरे पर किसी ने दस्तक दी। मैं रज़ाई में दुबका हुआ था, एक बार तो दस्तक को अनसुनी कर गया।

दरवाज़े पर थोड़ी देर बाद फिर दस्तक हुई। मैं अनिच्छापूर्वक रज़ाई से निकला और दरवाज़ा खोला। सामने स्कार्फ़ वाली युवती खड़ी थी। सहसा मुझे विश्वास न हुआ, लगा कोई सपना देख रहा हूं। आंखे मलते हुए मैंने दोबारा उसकी तरफ़ देखा। वह वही थी। पश्मीने के सफ़ेद शॉल में लिपटी हुई, सिर पर स्याह रंग का स्कार्फ़ था। 

'मैं अंदर आ सकती हूं?' उसने अत्यंत शालीनता से पूछा। 
'आइए-आइए' मैंने कहा और कमरे की एकमात्र कुर्सी से कपड़े लत्ते, पत्र-पत्रिकाएं उठाकर उसके लिए जगह बनाई, 'तशरीफ़ रखें।' 
वह महिला बैठ गई। मैं भी खाट पर बैठ गया। 
'मुझे रवींद्र कालिया से मिलना है।' 
'कहिए।' 
'आप ही रवींद्र जी हैं?' 
'जी।' मैंने पूछा, 'मैं आपकी क्या ख़िदमत कर सकता हूं?' 
मुझे लगा, सुबह-सुबह अपने यहां इस महिला को देखकर जितना आश्चर्य मुझे हो रहा था, उससे ज़्यादा ही उस महिला को हो रहा था। शकल सूरत से वह मुझे पहचान रही थी मगर नाम से नहीं। 'मैं मोहन राकेश की पत्नी हूं।' मैंने कल्पना भी न की थी कि वह महिला शादीशुदा होगी।

(रवींद्र कालिया की किताब 'गालिब छुटी शराब' का अंश)
1 month ago

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