सुविख्यात आलोचक और साहित्यकार नामवर सिंह का कहना है कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की आज जो दशा है, उस पर उन्हें रोना आता है। उन्होंने कहा कि कभी बीएचयू में माहौल ऐसा था कि मुश्किल से ही कहीं चारदीवारी नज़र आती थी। लड़कियां आज़ादी और सुरक्षा के बीच रहती थीं और कभी किसी अभद्रता की ख़बर नहीं सुनने को मिलती थी। लेकिन आज वहां की जो ख़बरें अख़बार में छपती हैं उन्हें पढ़कर सिर शर्म से झुक जाता है।
नामवर सिंह सोमवार को अपने निवास पर अमर उजाला परिवार के संपादकों से रूबरू थे और अपना दिल खोलकर दिखा रहे थे। अमर उजाला बैठक की संवाद सीरिज में आयोजित इस कार्यक्रम में नामवर सिंह ने बार-बार बनारस को याद किया। अपने सहपाठियों को, सहकर्मियों को और काशी में भैरों के सोंटे को याद किया। उन्होंने कहा कि काशी में कहावत है कि जिसे भैरों के सोंटे की चोट लग जाती है फिर वह काशी में नहीं रह पाता, एक शहर से दूसरे शहर भटकता रहता है।
आज के विभिन्न संदर्भों में उन्होंने बार-बार तुलसी की चौपाइयों को भी उद्धृत किया। 'लोकै च शास्त्राः' का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि खाली शास्त्र की बात से कुछ नहीं होता, उस पर लोकमानस की यानी जनता की सहमति की मुहर लगना भी आवश्यक है। एक संदर्भ में नामवर जी ने बताया कि कुछ बरस पहले कुछ साहित्यकारों ने उनसे फोन करके पूछा कि क्या वे अपने पुरस्कार वापस कर रहे हैं। उन्होंने जवाब में कहा कि पुरस्कार संस्थाएं देती हैं। सरकारी नीतियां गलत हैं तो उसमें संस्थाओं की क्या गलती? सरकार की सज़ा संस्थाओं को क्यों दी जाए?
वयोवृद्ध हो चुके नामवर सिंह ने बार-बार साबित किया कि उनके चिंतन की धार अब भी कायम है। लगभग दो घंटे चली वार्ता में उन्होंने राजनीति, साहित्य, विभिन्न सरकारों के समय में उन्हें मिली जिम्मेवारियों और कुछ राजनीतिक हस्तियों से उनकी चर्चित निकटता समेत कई विषयों पर खुलकर अपनी राय रखी। बातचीत का अंत उन्होंने फिराक गोरखपुरी के एक खूबसूरत शेर से किया, जिसका आशय कुछ यह था कि -- हंसते-खेलते आए थे मयखाने में फिराक, शराब पीकर लेकिन संजीदा हो गए....। इस शेर को पढ़कर उन्होंने यह कहकर अपने मेहमानों का मान बढ़ायाः आप प्यारे लोगों से बातचीत की शराब पीकर अब मैं संजीदा हो गया हूं।
8 वर्ष पहले
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