दुष्यंत कुमार का जन्म 1 सितंबर 1933 को बिजनौर में हुआ था। निधन भोपाल में 30 दिसंबर 1975 को हुआ था।
दुष्यंत कुमार वह दीप्तमान सूरज हैं जिनसे साहित्य दशकों से प्रकाशित है और सदियों तक प्रकाशमान रहेगा। दुष्यंत का लेखन हुक्मरानों के ख़िलाफ़ आम मानव की आवाज़ उठाता है और दिलों को छूता है। वह हिन्दी- ग़ज़लों के सम्राट कहे जाते हैं। अपनी इसी लेखन-विधा और इसमें उर्दू-हिन्दी के प्रयोग पर उन्होंने किताब 'साये में धूप' में अपनी बात कही है कि-
ग़ज़लों को भूमिका की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए, लेकिन एक कैफ़ियत इनकी भाषा के बारे में ज़रूरी है। कुछ उर्दू-दाँ दोस्तों ने कुछ उर्दू शब्दों के प्रयोग पर एतराज़ किया है। उनका कहना है कि शब्द 'शहर' नहीं 'शह्र' होता है, 'वजन' नहीं 'वज्न' होता है।
कि मैं उर्दू नहीं जानता...
कि मैं उर्दू नहीं जानता, लेकिन इन शब्दों का प्रयोग यहाँ अज्ञानतावश नहीं, जानबूझकर किया गया है। यह कोई मुश्किल काम नहीं था कि 'शहर' की जगह 'नगर' लिखकर इस दोष से मुक्ति पा लूं, किंतु मैंने उर्दू शब्दों को उस रूप में इस्तेमाल किया है जिस रूप में वे हिन्दी में घुल-मिल गए हैं। उर्दू का 'शह्र' हिंदी में 'शहर' लिखा और बोला जाता है, ठीक उसी तरह जैसे 'हिन्दी' का 'ब्राह्नण' उर्दू में 'बिरहमन' हो गया है और 'ऋतु' 'रुत' हो गई है।
उर्दू और हिन्दी अपने-अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती हैं तो उनमें फ़र्क कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। मेरी नीयत और कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज़्यादा से ज़्यादा क़रीब ला सकूँ। इसलिए ये ग़ज़लें इस भाषा में ही गई हैं, जिसे मैं बोलता हूँ।
ग़ज़ल की विधा एक बहुत पुरानी, किंतु सशक्त विधा है, जिसमें बड़े- बड़े उर्दू महारथियों ने काव्य-रचना की है। हिंदी में भी महाकवि निराला से लेकर आज के गीतकारों और नए कवियों तक अनेक कवियों ने इस विधा को आज़माया है। परंतु अपनी सामर्थ्य और सीमाओं को जानने के बावजूद इस विधा में उतरते हुए मुझे आज भी संकोच तो है, पर उतना नहीं जितना होना चाहिए था।
शायद इसका कारण ये है कि पत्र-पत्रिकाओं में इस संग्रह की कुछ ग़ज़लें पढ़कर और सुनकर विभिन्न वादों, रुचियों और वर्गों की सृजनशील प्रतिभाओं ने अपने पत्रों, मन्तव्यों एवं टिप्पणियों से मुझे एक सुखद आत्म-विश्वास दिया है। इस नाते मैं उन सबका अत्यंत आभारी हूँ।
... और कमलेश्वर! वह इस अफ़साने मे न होता तो ये सिलसिला शायद यहाँ तक न आ पाता। मैं तो-
'हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए।
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कि मैं उर्दू नहीं जानता...
7 वर्ष पहले
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