जीवन में विरह से हर कोई डरता है। अकेला रहना जीवन की सबसे बड़ी सजा कही जाती है। सब साथ चाहते हैं। यह सही भी है। साथ सुनहरा हो तो जीवन मंगल हो जाता है। भारत एक सामाजिक देश है। जहां समाज में मनुष्य उत्तरदायित्वों के साथ अपनी-अपनी भूमिका अदा कर रहा है। समाज में माता, पिता, भाई, बहन, पति-पत्नी, के अलावा दोस्ती का रिश्ता भी होता है।
सभी रिश्तों की कहीं न कहीं कोई सामाजिक बुनियाद है लेकिन दोस्ती और प्रेम के रिश्ते में बुनियाद सिर्फ प्रेम और विश्वास ही हैं। प्रेम दो भावनाओं की आत्म स्वीकरोक्ति है। यह किसी के भी साथ हो सकता है। यह जब होता है तो आदमी बस इसके भाव लहरियों में अपने आप बहने लगता है। इस बेचैनी से हर कोई बचने की कोशिश करता है। लेकिन जिसे यह मिलनी होती है, उसे मिल ही जाती है। बेचैनी दिल को प्रक्षालित करने लगती है। आदमी भाव से दूसरी दुनिया का हो जाता है। यूं कहें कि प्रेम में बेसुध आदमी लूटने के बजाए लुटने में लगा रहता है।
दिमाग से अलग दिल की बोली उसके लिए अहम हो जाती है। प्रेम करने के बाद अगर भावनाओं को सही विराम नहीं मिले तो इसकी तड़प और बढ़ जाती है। 'सारंगा' फिल्म का एक गीत इस विरह और तड़प को ही भलिभांति व्यक्त करता है। प्रेम के विरह से सराबोर 'सारंगा' फिल्म का गीत 'सारंगा तेरी याद में... मुझे बेहद अच्छा लगता है। इसके शब्द भाव आपको जीवन की सच्चाई यानी एकांत की ओर ले जाते हैं।
1961 में प्रदर्शित इस फिल्म में सुदेश कुमार और जयश्री गढ़कर ने सर्वोत्कृष्ट अभिनय किया है। दोनों के प्रेम विरह को बयां करता गीत 'सारंगा तेरी याद में नैन हुए बेचैन...प्रेम में अकेले हो जाने वाले एक पथिक की विरह भावना को अपने में समोए हुए है। गीत भरत व्यास ने लिखा है। सरदार मलिक ने इसे संगीत से सजाया है। मुकेश और मोहम्मद रफी की मादक आवाज ने इसमें सुहानी मादकता पिरो दी है। गीत की पहली लाइन ही विरह के मन को झंकृत कर देती है।
सारंगा तेरी याद में नैन हुए बेचैन
मधुर तुम्हारे मिलन बिना
दिन कटते नहीं रैन, हो
सारंगा तेरी याद में...
गीत में सुदेश कुमार ने भाव प्रणय अभिनय किया है। वह अपनी नायिका के साथ बिताए अनमोल पलों को याद करते हुए कहता है कि मिलन का कोई मतलब होना चाहिए। यही सृजन है बाकी सब निर्माण है, व्यर्थ है। जीवन में हर जगह मिलन हो रहा है। पर सृजन बहुत कम जगह हो रहा है। सृजन का अभाव ही संताप है। जहां सृजन है वहां सुख, समृद्धि और संपन्नता है। गीत में विरह की व्यंजना काफी सुरम्य है। गीत इतना मधुर है कि यह हर किसी के अंदर एकाकी भाव को पैदा करने की कोशिश करता है। गीत के बोल काफी गहन हैं।
वो अम्बुवा का झूलना, वो पीपल की छांव
घूंघट में जब चांद था, मेहंदी लगी थी पांव
हो, (आज उजड़के रह गया-2)
वो सपनों का गांव, हो ...
सारंगा तेरी याद में ...
नायक कहता है कि जो तुम्हारे साथ पल बीत गया वही मेरे लिए सब कुछ है। बाकी मैं जो भी जीवन जिया वह व्यर्थ है। तुम्हारा साथ मेरे जीवन का सार है। विरह में मेरी आंखों में तुम्हारी यादों के अश्रु निकल गए और आंखों से ओझल भी हो गए हैं। मैं निस्तब्ध हूं। मैं समझ नहीं पा रहा हूं जीवन किस तरह आगे बढ़ाऊं। मैं अकेले विरह में उलझ सा गया हूं। मुझे मेरे भावों का संयोजन खोने में काफी डर लग रहा है।
संग तुम्हारे दो घड़ी, बीत गये जो पल
जल भरके मेरे नैन में, आज हुए ओझल
हो, (सुख लेके दुःख दे गयीं-2)
दो अखियां चंचल, हो ...
सारंगा तेरी याद में ...
सारंगा तेरी याद में नैन हुए बेचैन
मधुर तुम्हारे मिलन बिना दिन कटते नहीं रैन
मधुबन के मधुकुंज में चलत बिरहा समीर
बाट तकूं तेरी मैं प्रिये जल जमुना के तीर
अंतिम पंक्तियों में नायक कहता है कि मैं आज भी तेरी बाट यानी राह तकता हूं। मुझे इंतजार है अपनी मुक्ति का। तुम्हे देखे बिना मचले दिल को करार नहीं आता है। भाव ठहरे हुए इधर उधर भटकने लगते हैं। हिलोर मारते हैं। किनारे के लिए तरसता हूं। मांझी मिज ताए तो करार आ जाए। पर ऐसा अब कहां, अब तो दूर-दूर तलक विरह ही है।
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