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जयंती विशेष: शैलेंद्र-सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी...  

शैलेंद्र
                
                                                         
                            प्रसिद्ध गीतकार शैलेंद्र का जन्म 30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी, पाकिस्तान में हुआ था। निधन मुंबई में 14 दिसंबर 1966 को हुआ। शैलेंद्र साधारण से शब्दों के साथ आम आदमी की आवाज थे। पूरे करियर में एक से बढ़कर एक गीत लिखे। शैलेंद्र राजकपूर के मनपसंद गीतकार रहे। शैलेंद्र का एक गीत मुझे बहुत पसंद है। उनकी जयंती पर मैं उस गीत की खास चर्चा करना चाहूंगा।
                                                                 
                            

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इस दुनिया में चाह कर भी झूठ नहीं बोल पाते हैं। बाते नहीं बना पाते हैं। किसी की खुशामद नहीं कर सकते हैं। समय के साथ ना बदलने वाले लोग अक्सर अकेले रह जाते हैं। जीवन संघर्ष है...यह एक शाश्वत सत्य है। लेकिन बदलते दौर में जीवन अब एक आर्ट भी हो गया है। लेकिन हमेशा 'सच' यानी इंसानियत और प्रेम भाव को पकड़ कर रखने वाले लोग अपने जीवन को आर्टफुल नहीं बना पाते हैं। फिल्म 'अनाड़ी' का गीत सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी...ऐसे लोगों के जीवन को बखूबी बयां करता है।

 

राजकपूर गीतकार शैलेंद्र को काफी पसंद करते थे...

राजकपूर के संजीदे अभिनय से सजे इस गीत को आज भी बिना गलती किए गम का सामना करने वाले लोग गुनगुनाते है और इसके जरिए अपने दिल को समझाते हैं। 1959 में रिलीज यह फिल्म राजकपूर के शानदार अभिनय के लिए जानी जाती है। इसके अलावा इस फिल्म के गीत भी काफी गहरा अर्थ लिए हुए हैं। इन्हीं गीतों में से यह गीत तो भावुक अंदाजों का एक मनमोहक पुलिंदा है।

राजकपूर गीतकार शैलेंद्र को काफी पसंद करते थे। वह कोशिश करते थे कि उनकी फिल्मों में गीतकार शैलेंद्र ही हों। लिहाजा अनाड़ी फिल्म के इस गीत को भी शैलेंद्र ने लिखा और शंकर -जयकिशन ने संगीत से सजाया है। मुकेश ने गीत में अपनी आवाज दी है। राजकपूर के लिए मुकेश से बेस्ट गायक और कोई हो नहीं सकता था। मुकेश की अवाज में यह गीत ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे राजकपूर ने खुद इस गीत को गाया है। इस गीत में प्रेम को हमेशा बरकरार रखने की कोशिश की गई है। इसी कोशिश की वजह से यह गीत मुझे बेहद पसंद है। 
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राजकपूर गीतकार शैलेंद्र को काफी पसंद करते थे...

8 वर्ष पहले

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