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आसान अल्फ़ाज़ में प्रेम की कठिन डगर को व्यक्त करती पंक्तियां- सावन का महीना, पवन करे शोर...

remembrance of sawan ka mahina pawan kare shor song
                
                                                         
                            
आज हर दिल अज़ीज़ गायक मुकेश का जन्मदिन है। 22 जुलाई 1923 को दिल्ली में पैद हुए मुकेश का पूरा नाम मुकेश चंद माथुर था। मुकेश की दिलकश आवाज़ में गाए गीतों की दीवानगी आज भी बरक़रार है।

वैसे तो साल में 12 महीने होते हैं और उनकी अपनी-अपनी ख़ासियत होती है, लेकिन सावन के महीने की बात ही कुछ और है। यह महीना मुझे बेहद पसंद है। इसमें बारिश की फुहारें मन को गुदगुदाती हैं। बचपन मन में अंगड़ाई लेने लगता है। दिल कहता है बारिश की बूंदों का एक घर बना लूं। जहां हर वक़्त सावन की बहार हो।

बूंदों का घर न सही...मगर 1967 में रिलीज़ 'मिलन' फ़िल्म का गीत 'सावन का महीना, पवन करे सोर' मुझे बहुत अज़ीज़ है। सुनील दत्त और नूतन पर फ़िल्माए गए इस गीत को गीतकार आनंद बक्षी ने क़लमबंद किया है। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत से सजा यह गीत बड़ा मनोहारी है। वहीं, लता मंगेशकर और मुकेश ने अपनी दिलकश आवाज़ से इसे लाफ़ानी बना दिया है। इस गीत की एक ख़ास बात है कि यह बहुत ही सरल ज़बान में है। पूरे गीत में सिर्फ ऐसे शब्द हैं जो आम बोल-चाल में इस्तेमाल होते हैं।

गीत की शुरुआत कुछ यूं होती है...

'सावन का महीना, पवन करे सोर
सावन का महीना, पवन करे शोर
पवन करे सोर
पवन करे शोर
अरे बाबा शोर नहीं, सोर, सोर, सोर

पवन करे सोर
जियारा रे झूमे ऐसे, जैसे बनमा नाचे मोर'

इस गीत की पंक्तियां ऐसीं है कि पूरा गीत सुने बिना रहा ही नहीं जा सकता। इस गाने में बड़ी ही ख़ूबसूरती से सावन और पवन यानी हवा के तालमेल को बयां किया गया है। साथ ही शब्द के उच्चारण पर भी इस गीत पर ध्यान दिया गया है। फ़िल्मांकन में दिखाया गया है कि नूतन बार-बार 'शोर' शब्द बोलती हैं। लेकिन, सुनील दत्त उन्हें हर बार 'सोर' गाने के लिए कहते हैं। 

'रामा गजब ढाए, ये पुरवैया
नैया संभालो कित खोये हो खिवैया
होय पुरवैया के आगे चले ना कोई जोर
जियारा रे झूमे ऐसे, जैसे बनमा नाचे मोर'

ये पंक्तियां प्रेमियों के आपसी भरोसे के एहसास को साफ़ तौर पर ज़ाहिर करती हैं। ज़िंदगी में कभी ऐसा भी वक़्त आता है जब मोहब्बत करने वाले दुनिया में ख़ुद को तन्हा महसूस करते हैं। उनके आसपास लोग होते हैं, लेकिन इसके बावजूद उनकी तन्हाई सिर्फ़ उसे ढूंढती है जो उनके दिल के ख़ालीपन को दूर कर सके। जब भी ये मरहला आता है ज़िंदगी ग़म के भंवर में उलझ जाती है और सुकून की तलाश नामुमकिन सी नज़र आती है।

'मौजवा करे क्या जाने हमको इसारा
जाना कहां है पूछे नदिया की धारा
मर्जी है तुम्हारी ले जाओ जिस ओर
जियारा रे झूमे ऐसे, जैसे बनमा नाचे मोर'

आसान अल्फ़ाज़ में प्रेम की कठिन डगर को व्यक्त करती ये लाइनें भविष्य की टोह लेने को कह रही हैं। साथ ही इनमें मोहब्बत में महबूब पर पुख़्ता यक़ीन रखने पर भी ज़ोर दिया गया है। जब भी हम जीवन में लक्ष्य निर्धारित किए बिना निकलते हैं, तो कभी-कभी ऐसा होता है कि सफ़र में ख़ुद-ब-ख़ुद लक्ष्य हासिल हो जाते हैं। सिर्फ़ दृढ़ संकल्प होना चाहिए। राहें जिधर ले जाती हैं इश्क़ का मुसाफ़िर उधर ही चल देता है। उसे यह भी नहीं पता होता कि उसकी अपने प्रीतम से मुलक़ात होगी भी या नहीं। इसीलिए महबूब क़िस्मत को नदिया की धारा की मर्ज़ी पर छोड़ उसे पूरा हक़ देता है वो जहां चाहे ले जाए।

'जिनके बलम बैरी गए हैं बिदेसवा
आई हैं लेके उनके प्यार का संदेसवा
कारी मतवारी घटाएं घनघोर
जियारा रे झूमे ऐसे, जैसे बनमा नाचे मोर'

इन पंक्तियों में आशिक़ और माशूक़ की दूरियों की वजह से आए दुख को पिरोया गया है। वैसे भी, दो मोहब्त करने वाले अगर एक-दूसरे से दूर हो जाएं, तो उनके अलावा शायद ही उनके ग़म को और कोई समझ पाए। महबूब की जुदाई में दुनिया की हर ख़ुशी अदना दिखाई देती हैं। जुदाई का हर लम्हा कांटा महसूस होता है और  हर पल, यादों में दुख़ की घनघोर घटाएं मंडराती रहती हैं। 

आप भी सुनिए इस कर्णप्रिय लाजवाब नग़मे को- 

मोहम्मद अकरम
4 वर्ष पहले

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