ये चेहरे इश्क ना जाने
ये परदे हटा देती है
जहां दिल का है ठिकाना
ये राहें बता देती है
मुसाफ़िर मैं हूँ फिर भी
मंजिल पास तू है
चलूँ मैं जिस राह पर
तू है वहां
यह गाना हालिया रिलीज़ फ़िल्म ‘मित्रों’ का है, कुछ ही वक़्त पहले अचानक यह गाना मेरे कानों में पड़ा, सुनकर लगा कि तनिष्क बागची ने यह गाना लिखा भी ख़ूब है और इसे संगीतबद्ध भी ख़ूब किया है और आतिफ़ की आवाज़ इसे और भी मजबूत बनाती है कि तभी आगे की लाइन कान में पड़ी।
चलते चलते..
चलते चलते..
यूँ ही कोई मिल गया था
यूँ ही कोई मिल गया था
सर-ए-राह चलते चलते
तब 1971 की फ़िल्म पाकीजा का गाना ‘चलते-चलते’ याद हो आया, जिसे ग़ुलाम मोहम्मद के संगीत पर कैफ़ी आज़मी ने लिखा है और इसे लता मंगेशकर ने गाया है।
पाकीजा का चलते-चलते मेरे पसंदीदा नग़्मों में से एक रहा है जिसे अक्सर दोस्तों के साथ तो कभी अकेले में भी मैंने गुनगुनाया है। इस गाने में मीना कुमारी मानो दिल ही ले जाती हैं। मुजरे की विधा में फ़िल्माया गया यह गीत जिसके बोल और पायल की झंकार पर मन झंकृत होने लगता है।
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चलते चलते..
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