कई गीत ऐसे होते हैं जो किसी बिंब या प्रतीक के सहारे अपनी पूरी बात कह जाते हैं। 1968 में रिलीज सरस्वतीचन्द्र का यह गीत मुझे इसीलिए पसंद है। गीत के बोल इंदिवर ने दिए हैं। संगीत से इसे कल्याणजी आनंदजी ने सजाया है। लता मंगेशकर और मुकेश ने इसमें अपनी आवाज़ दी हैं।
यह गीत प्रेम का स्वर्गिक स्वरूप अापके समक्ष रखता है। वादों और विश्वास की महीन चादर बुनता है। प्रीत की रीति दुनिया को सिखाता है। गीत भावभरे एक व्याकुल मन को गहरा ठहराव देता है। यह गीत प्रेम के बाद बदले में कुछ मांगने वाली सोच को दरकिनार करते हुए सिर्फ और सिर्फ समर्पण की बात कहता है।
प्रेम क्या है, शायद एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति...
प्रेम क्या है, शायद एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति और यह गीत किन्हीं दो लोगों को इसी एहसास के साथ एक करता है। प्रणय निवेदन में समर्पण का ऐसा भाव बोध अन्यत्र किसी अन्य गीत में नहीं दिखता है। यह गीत दरअसल प्रेम की पाती के भाव बयां करता है। एक तरह से ये प्रेम का मनुहार भरा आमंत्रण है।
इस गीत के बोल से पता चलता है कि प्रेमी-प्रेमिका के बीच का प्रेम महज़ वासना नहीं बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक संबंध है। अनुभूति है। यह गीत काफ़ी गहरा है और जीव को प्रेम के जरिए ईश्वर से भी जोड़ता है। गीत में प्रेमी ने जिस तरह से अपना प्रणय निवेदन किया है उसी अंदाज़ में मैंने भी अपने जीवन में एक 'कोशिश' की थी। इसलिए यह गीत मेरे लिए सबसे अज़ीज़ है। मेरी कोशिश का नतीजा मनमाफिक नहीं रहा पर चाह की उड़ान को आगे और वक़्त के साथ नया आयाम नहीं मिल पाया। ख़ैर बात करें गीत की तो इसमें समर्पण का भाव ही सबसे ज़्यादा है।
नायक कहता है कि मैंने फूल के रूप में आपको दिल भेजा है...
फूल तुम्हें भेजा है ख़त में
फूल नहीं मेरा दिल है
प्रियतम मेरे तुम भी लिखना
क्या ये तुम्हारे क़ाबिल है
गीत के ये बोल एक तरह से प्रेम का प्रस्ताव है। नायक कहता है कि मैंने फूल के रूप में आपको दिल भेजा है। बिना जाने समझे मन को आपके सामने समर्पित कर दिया है। अब आप इसे जाने, समझे और परखें। नायक अपने प्रेम की बानगी देता है। समुंदर में छिपे मोतियों का उल्लेख करता है। उनकी तुलना अपने मन की भावनाओं से करता है।
गीत में प्रेम के लिए कोई शर्त नहीं रखी गई है...
प्यार छिपा है ख़त में इतना
जितने सागर में मोती
चूम ही लेता हाथ तुम्हारा
पास जो मेरे तुम होती
फूल तुम्हें भेजा है ख़त में ...
गीत में प्रेम के लिए कोई शर्त नहीं रखी गई है बल्कि नायक तो यहां तक कह डालता है कि कब आ रहे हो यह स्पष्ट करो और तो और अपने आने की 'सूरत' भी लिख डालो। गीत यह भी कहता है कि प्रेम अगर हो जाए तो फिर भूलना नहीं, अगर भूल गए तो यह किसी के समर्पण का एक तरह से अपमान होगा।
प्रेम तो महज एक घटना है। यह जब घटती है तो फिर आदमी के बस का नहीं कि उस क्रेश से बच जाए। इसलिए गीत में निवेदन करते हुए नायक इस घटना के अंजाम से वाक़िफ़ होकर हौले-हौले बढ़ता है। प्रेम करने के बाद अगर साथी साथ छोड़ता है तो फिर प्रेम में जग बदनामी के अलावा और कोई रास्ता नहीं।
बेचैनी दो दिलों को जोड़ने का एक जरिया है...
गीत में प्रेम के बाद की परिस्थितियों का भी वर्णन किया गया है। बेचैनी दो दिलों को जोड़ने का एक जरिया है। अगर दो लोग एक दूसरे के लिए बेचैन हैं इसका मतलब यही है कि वह आपस में भाव से एक हो सकते हैं। जुड़ सकते हैं। कम से कम एक दूसरे से हमेशा खुश रहने का वादा कर सकते हैं। किसी भी हाल में रह लेने की हिम्मत पैदा कर सकते हैं।
दो लोग अगर एक दूसरे की सभी मानसिक और शारीरिक जरूरतों की पूर्ति करते हुए हर समय खुशहाल और संतुष्ट रहने लगे तो शायद उनके बीच मोक्ष पैदा हो जाए। ईश्वर का प्राकट्य हो जाए। एक गहरी लंबी शांत अनुभूति होने लगे। दो विपरीत शारीरिक बनावट के लोगों के बीच इस तरह का संबंध सिर्फ और सिर्फ प्रेम तथा उसके समर्पण से ही संभव हो पाएगा। समय के साथ दुनिया और भी हसीन होती जाएगी। विकल्पों की कभी कमी नहीं होगी। समय की धारा के बीच दुनिया में आने-जाने का क्रम यानी यह जीवन सफर जारी रहेगा लेकिन अनंत ठहराव और सुकून से बेहतर मुकाम इस जीव के लिए और कोई नहीं है। यह एक शाश्वत सत्य है। प्रेम और समर्पण इस सत्य को खोजने के दो बेहतर माध्यम हैं। गीत इन्हीं माध्यमों की व्याख्या करता है।
अगर प्रेम करना तो छोड़ना मत...
नींद तुम्हें तो आती होगी
क्या देखा तुमने सपना
आंख खुली तो तन्हाई थी
सपना हो न सका अपना
तन्हाई हम दूर करेंगे
ले आओ तुम शहनाई
प्रीत लगा के भूल न जाना
प्रीत तुम्हीं ने सिखलाई
फूल तुम्हें भेजा है ख़त में ...
गीत यह भी कहता है कि अगर प्रेम करना तो छोड़ना मत। वरना फिर बदनामी के बीच इस दुनिया को मजबूरन छोड़ना पड़ेगा। मौत को गले लगाना पड़ेगा। नायक अपनी उदात्त भावनाओं के साथ प्रेम की बेचैनी को भी भलिभांति व्यक्त करता है।
सच्चा प्रेम विरह की एक लंबी दास्तां है...
गाने के बोल में यह भी कहा गया है कि नींद तुम्हे तो आती होगी, क्या देखा तुमने सपना। यह एक तरह से सवाल है कि प्रेम की तड़पन में नींद आख़िर आती कहां है? वहां तो सिर्फ़ बेचैनी है। तड़प है, प्यास है। सच्चा प्रेम विरह की एक लंबी दास्तां है। अंत में प्रेम की बेचैनी, समर्पण, अपने प्रेम के अध्येता को ही अराध्य समझने की कल्पना मुझे इस गीत से अनन्य भाव से जोड़ती है।
ख़त से जी भरता ही नहीं
अब नैन मिले तो चैन मिले
चांद हमारी अंगना उतरे
कोई तो ऐसी रैन मिले
मिलना हो तो कैसे मिले हम
मिलने की सूरत लिख दो
नैन बिछाये बैठे हैं हम
कब आओगे ख़त लिख दो
फूल तुम्हें भेजा है ख़त में ...
कभी प्रेम को महसूस करना हो तो इस गीत को अाप भी गुनगुनाइए...
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