दोस्ती इस अनजान दुनिया को जान और पहचान दिलाती है। दोस्ती दुनिया का सबसे अनमोल तोहफा है। हिंदी फिल्मों में दोस्ती के रंग बिखेरे गए हैं। प्रेम, त्याग, साझेदारी, समझदारी इन सबको दोस्ती अपने में समोए रहती है। 1964 में प्रदर्शित फिल्म दोस्ती का गीत कोई जब राह न पाए...दिल में भावुक एहसास को मचलने के लिए मजबूर कर देता है। इस गीत को सुनकर हर इंसान दोस्ती में आगे बढ़कर एक दूसरे को सहयोग करने की सोचता होगा। गीत का यही एक सच्चा सार है। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की स्वर्णिम प्रतिभा ने इस गीत को संगीत से सजाया है। मजरूह सुल्तापुरी ने इस गीत को लिखा है। मोहम्मद रफी की रूहानी आवाज ने इसमें गजब की संजीदगी प्रदान की है।
गीत की पहली लाइन में ही विश्वास शब्दों के साथ झलकने लगता है
भावुक इंसान के लिए यह गीत एक अनमोल तोहफा है। फिल्म दो दोस्तों की कहानी पर आधारित है। यह गीत फिल्म की बुनियाद कहा जा सकता है। रफी ने जिस अंदाज से इसे गाया है उसके वर्णन के लिए मेरे पास शब्द नहीं है। मैं जब इस गीत को सुनता हूं तो बस सुनता हूं। न बोल पाता हूं न लिख पाता हूं। यही वजह है कि यह गीत मेरे अजीज नगमों की सूची में शामिल है। कर्णप्रिय गीतों की वजह से ही इस फिल्म को 6 फिल्मफेयर अवार्ड मिले थे। दृष्टिहीन दोस्त ने इस गीत को फिल्म में गाया है। गीत में दोस्ती को एक विश्वास के रूप में दर्शाया गया है।
कोई जब राह न पाए, मेरे संग आए
के पग पग दीप जलाए, मेरी दोस्ती मेरा प्यार
गीत में दोस्त कहता है कि जीवन में प्रेम-सहयोग से ही सब कुछ संभव हो पाएगा
गीत में दोस्त कहता है कि जीवन में प्रेम और सहयोग से ही सब कुछ संभव हो पाएगा। बिना प्यार के आप दुखी रहेंगे। दोस्ती को सब कुछ मानने पर जीवन की सारी मुश्किलें आसान हो जाएंगी। गीत दो दिव्यांग दोस्तों पर आधारित है। एक के पास नजर नहीं है तो दूसरे के पास चलने के लिए पांव नहीं हैं। इसके बाद भी दोनों दोस्तों ने फिल्म में दोस्ती को हर पल मजबूत किया है। एक नई ताजगी दी है। इन दुखियारों दोस्तों के मुख से निकले गीत लोगों को असीम प्रेरणा और ऊर्जा देते हैं।
गीत के आगे के बोल हैं...
जीवन का यही है दस्तूर
प्यार बिना अकेला मजबूर
दोस्ती को माने तो सब दुख दूर
कोई काहे ठोकर खाए, मेरे संग आए ...
दोनो के हैं रूप हज़ार
पर मेरी सुने जो संसार
दोस्ती है भाई तो बहना है प्यार
कोई मत चैन चुराए, मेरे संग आए ...
प्यार का है प्यार ही नाम
कहीं मीरा कहीं घनश्याम
दोस्ती का यारो नहीं कोई दाम
कोइ कहीं दूर ना जाए, मेरे संग आए ...
गीत के अंतिम बोल में कहा गया है कि प्यार का नाम सिर्फ प्यार ही होता है
गीत के अंतिम बोल में कहा गया है कि प्यार का नाम सिर्फ प्यार ही होता है। प्यार का विकल्प सिर्फ प्यार ही होता है। इसलिए सबसे कीमती चीज है प्यार। फिल्म में एक सड़क दुर्घटना में रामू अपनी एक टांग गंवा बैठता है। बेघर, बिन पैसे के और अपाहिज रामू जब मुंबई की सड़कों की ख़ाक छान रहा होता है तो उसकी मुलाकात मोहन से होती है। जो अंधा है। मोहन की कहानी भी रामू के जैसी ही है। मोहन गांव का रहने वाला है और बचपन में ही अपनी आंखें खो बैठा है। मोहन की बहन मीना गांव से शहर नर्स बनने के लिए आई थी ताकि मोहन की आंखों का इलाज करा सके। अब मोहन अपनी बहन को ढूंढता हुआ शहर आया है। रामू और मोहन गलियों में गाकर अपना पेट भरने लगते हैं और सड़क के किनारे ही सो जाते हैं। वह किसी से रहम नहीं मांगते हैं। वह अपनी मुश्किलों को खुद खुद्दारी से दूर करना चाहते हैं। उनकी दोस्ती और स्वाभिमान को फिल्म में बड़ी संजीदगी से दिखाया गया है।
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गीत की पहली लाइन में ही विश्वास शब्दों के साथ झलकने लगता है
5 वर्ष पहले
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