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महंगाई डायन ...एक बढ़ता हुआ दर्द जो गीत बन गया 

महंगाई
                
                                                         
                            सखी सईंया तो खूब ही कमात है
                                                                 
                            
महंगाई डायन खाये जात है


फिल्म ‘पीपली लाइव’ का यह गीत काफी लोकप्रिय हुआ था। इस गीत के माध्यम से एक प्रमुख सामाजिक-आर्थिक समस्या 'महंगाई' की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया गया है।

अगर हम यह कहें कि देश में महंगाई और रोजगार जैसे मुद्दों पर जनता में लामबंदी बहुत कम देखी जाती है,  लोग सड़कों पर नहीं उतरते तो मान लीजिए कि यह सरकारों का सौभाग्य है। असल में यही देश का दुर्भाग्य भी है। 

सरकारें एक-दूसरे को कोसती रह जाती हैं। कोई कहता है पुराने दिन ही भले थे, कोई अच्छे दिन की ढांढस बंधाता रह जाता है। लेकिन समस्या जत की तस मुंह बाय़े खड़ी है। 

इससे महंगाई के दौर में सत्ताधीशों को मौका मिल जाता है और उन पर कोई दबाव नहीं बन पाता। जिन आंखों में भविष्य के सुनहरे सपने रहने चाहिए, उनमें हताशा और निराशा देखने को मिलती है। बेरहम भूख, लोगों की जरूरतों के मद्दे नजर होने वाले कोशिशों को दो जून की रोटी तक समेट देती है। फिल्म 'पिपली लाइव' का यह गीत देश के ऐसे ही कमजोर लोगों के मन में उभरते हुए दर्द की अभिव्यक्ति है। 

हर महीना उछलै पेटरोल, डीजल का भी बढ़ गया मोल 
शक्कर का भी बढ़ गया मोल 
उसमें बासमती चावल धान मारी जात है
महंगाई डायन खाए जात है
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8 वर्ष पहले

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