अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ऐश ही ऐश है न सब ग़म है
ज़िंदगी इक हसीन संगम है
- अली जवाद ज़ैदी
सारी ख़ुशी हमारी आँखों से छन रही है
कुछ देर तुम ने गेसू लहरा दिए तो क्या है
- रउफ़ रज़ा
मुस्कुराना भी एक फ़न है 'अज़ीज़'
सब को आता नहीं ज़माने में
- अज़ीज़ ग़व्वासी
दिलों को तेरे तबस्सुम की याद यूँ आई
कि जगमगा उठें जिस तरह मंदिरों में चराग़
- फ़िराक़ गोरखपुरी
बड़ी आरज़ू थी हम को नए ख़्वाब देखने की
सो अब अपनी ज़िंदगी में नए ख़्वाब भर रहे हैं
- उबैदुल्लाह अलीम
दरवाज़ा खटखटा के सितारे चले गए
ख़्वाबों की शाल ओढ़ के मैं ऊँघता रहा
- आदिल मंसूरी
Urdu Poetry: तू कहानी ही के पर्दे में भली लगती है