आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ये कलियां कितनी बदल गईं

Ye kaliyan kitni badal gayi.
                
                                                         
                            ये कलियां कितनी बदल गईं,
                                                                 
                            
ये कलियां कितनी बदल गईं।

जो आपस मे सब सिकुड़ी थी,
फूलों में कैसे निकल गईं।

ये कलियां कितनी बदल गईं,
ये कलियां कितनी बदल गईं।

सबका तो एक ही लक्ष्य पड़ा,
होगा सबसे अब कौन बड़ा।

गंध से या सुगंध से ,
बागो में कैसे बिखर गई।

ये कलियां कितनी बदल गईं,
ये कलियां कितनी बदल गईं।

तेज पवन को कैसे सहती है,
सूर्य के तेज प्रकाश में रहती है।

थोड़े से जल के आस में बागो में,
बागो में कैसे सिमट गयीं।

ये कलियां कितनी बदल गईं,
ये कलियां कितनी बदल गईं।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर