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अपनी तो जैसे तैसे...डफली पर दमदार थिरकन और लावारिस एहसास 

लावारिस
                
                                                         
                            बॉलीवुड में अमिताभ बच्चन और प्रकाश मेहरा की जोड़ी ने कई यादगार फिल्में दीं। मुझे लगता है कि प्रकाश मेहरा अमिताभ बच्चन के लिए ही बने थे। दिग्गज निर्माता निर्देशक प्रकाश मेहरा ने जंजीर, लावारिस, मुकद्दर का सिकंदर, खून पसीना, शराबी सहित अन्य फिल्मों में अमिताभ को एंग्रीयंग मैन से एक दीवाने व्यक्तित्व का जो कलेवर दिया है, वह बरसों याद रहेगा। प्रकाश मेहरा की 1981 में रिलीज लावारिस फिल्म सुपरडुपर हिट थी। इस फिल्म की काफी दमदार कहानी थी। इसमें अमिताभ बच्चन ने हमेशा की तरह सशक्त अभिनय किया। फिल्म में सारे गीत कर्णप्रिय थे और अपने जमाने में बहुत लोकप्रिय हुए। इसका एक गीत अपनी तो जैसे तैसे...मुझे खासतौर पर प्रिय है।
                                                                 
                            

फिल्म की तरह यह गीत भी शानदार है क्योंकि इसे खुद निर्माता प्रकाश मेहरा ने लिखा है। कल्याणजी आनंद जी के संगीत में सजे इस गीत का फिल्मांकन और अमिताभ की दिलकश थिरकन मुझे खासतौर पर पसंद है। आज भी शादी बारात में जब कोई मुझे नृत्य के लिए आग्रह करता है तो मेरे पांव इस गीत पर अपने आप थिरक जाते हैं। गीत फिल्म की कहानी पर पूरी तरह आधारित है। लावारिस उसको कहते हैं जिसके मां-बाप का पता नहीं होता। फिल्म में अमिताभ ने एक लावारिस युवक की भूमिका निभाई है। मां-बाप को जानने के लिए वह जीवन भर तड़पते है। 

एक कैबरे में खलनायक रंजीत और अमिताभ पर फिल्‍माए गए इस गीत के शुरुआती बोल ही दिल में अजीब सी रुहानियत भर देते हैं। किशोर कुमार ने जिस अंदाज में इस गीत को गाया है, वह लाजवाब है।  एक लावारिस के‌ लिए लिखे गए इस गीत में जोश और जज्बात दोनों कूट-कूट कर भरे हुए हैं। लावारिस होने के बाद भी अमिताभ ने फिल्म में इंसानियत की जो मिसाल पेश की है, वह दर्शाती है कि अमीरी, समाज, रिश्तों और संबंधों के बगैर भी इंसान बेहतर हो सकता है। हमेशा बेहतर होने की चाह इंसान का मूल स्वभाव है। दुनिया की चकाचौंध के बीच भले ही वह इस एहसास हो भूल जाए। लेकिन अंत में इंसानियत के एहसास के साथ ही उसे लंबा सुकून मिलता है। गीत की पहली पंक्ति इस प्रकार है- 

'हाए अपनी तो जैसे तैसे थोड़ी ऐसे या वैसे ) -2
कट जाएगी
आपका क्या होगा जनाबेआली
आपका क्या होगा
अपने आगे ना पीछे
ना कोई उपर-नीचे ) -2
रोने वाला
ना कोई रोने वाली जनाबेआली
आपका क्या होगा' 


अमिताभ इस गीत में डफली पर डांस करते हुए अमीर रंजीत से कहते हैं कि हम लावारिस हैं, हमारी कैसे भी कट जाएगी, हमें समाज की चिंता नहीं। पर जनाब आप अगर समाज के प्रति अपने दायित्व को शिद्दत से नहीं ‌निभाए तो परेशानी में फंस सकते हैं। ऐसे हालात में आपका क्या होगा? हमारे आगे पीछे कोई नहीं है। पर आप समाज के दायरे में बंधे हुए हैं। इसके बाद भी आप मनचले ही रहे, तो आपके जीवन के ‌लिए यह काफी निराशाजनक होगा। आप डर कर जिएंगे और हम बेखौफ जिएंगे।

गीत में अमिताभ लावारिस होने का दंश व्यक्त करते हैं

लावारिस PC: यू ट्यूब

दूसरी पंक्ति में अमिताभ लावारिस होने का दंश व्यक्त करते हैं-

'आप भी मेरी तरह इंसान की औलाद हैं
आप मुंह मांगी दुआ हम अनसुनी फरियाद हैं ) -2
वो जिन्हे सारा ज़माना समझे लावारिस यहां
आप जैसे ज़ालिमो के ज़ुल्म की ईजाद है -2
गाली हुज़ूर की तो लगती दुआओं जैसी -2
हम दुआ भी दे तो लगे है गाली
आपका क्या होगा'


अमिताभ कहते हैं कि लावारिस का जन्म तब होता है जब कोई समाज के अपने दायित्व को भूल कर एक नवजात को इस जीवन में यूं ही तड़पने के लिए अकेला छोड़ देता है। रंजीत से अमिताभ कहते हैं कि आप मुंह मांगी दु‌आ हैं और हम अनसुनी फरियाद हैं। हमारा जन्म हमारे लिए पैदा होते ही पाप हो जाता है। और आप अमीर घर में पैदा होकर चाहे जितने पाप करो, आप पर समाज तनिक भी ऊंगली नहीं उठाता। हम अच्छा भी काम करेंगे तो हम पर सवालिया निशां उठ जाएंगे, ऐसा इसलिए क्योंकि हम लावारिस हैं और आपके पास धन-दौलत, समाज, रिश्ते-नातों के बीच बहुत से 'वारिस' हैं। इसी वजह से कोई भी आपकी करतूत पर आपको कुछ नहीं बोलेगा। अमिताभ कहते हैं कि आप जैसे वारिस वाले इज्जतदार लोगों की ही देन होते हैं हम जैसे लावारिस लोग, आप गाली देंगे तो वह दुआओं जैसी होगी और हम दुआ भी करेंगे तो लोग उसे गाली समझ लेंगे। अंतिम पंक्तियों में भी अमिताभ लावारिस होने का दुख और एहसास बड़ी शिद्दत से व्यक्त करते हैं। 


'आपके माथे से छलके जो पसीना भी कहीं
आसमान हिलने लगे और कांप उठे ये ज़मीन
आपका तो ये पसीना खून से भी क़ीमती
और अपने खून की क़ीमत यहां कुछ भी नहीं
अपना तो खून पानी जीना-मारना बेमानी -2
वक़्त की हर अदा है अपनी देखी-भाली
आपका क्या होगा'


गीत में अमिताभ कहते हैं कि आप जैसे इज्जतदार लोगों के माथे से थोड़ा पसीना भी छलक जाए तो उसे पोछने वाले हजारों मिल जाएंगे, क्योंकि आप पैसे वाले हो, रिश्तेदारों से घिरे हुए हो। लेकिन हम लावारिसों का खून भी आपके पसीने से सस्ता है। अमिताभ इस गीत में समाज की रवायत पर सवाल उठाते हैं। वो कहते हैं कि आदमी की सफलता को ही उसका चरित्र मान लिया जाता है। उसके धन को उसका सबसे बड़ा गुण मान लिया जाता है। समाज ऐसे ही इज्जतदार और रसूखदार लोगों को पसंद करता है, जो किसी भी तरह सफल हैं। लावारिस तो समाज में एक गंदी नाली के कीड़ा के सिवाय और कुछ नहीं होता। उसे जिंदगी भर लोगों के तानों का सामना करना पड़ता है। अपने अस्तित्व के मूल यानी सच को खोजने के लिए ता उम्र लावारिस होने का दंश झेलना होता है। इसके बाद भी उसे पता नहीं चलता कि उसका वारिस कौन है?  
 
9 वर्ष पहले

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