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पुलवामा की धरती रोयी...

                
                                                         
                            वीर सपूतों! फ़ख्र है तुम पर
                                                                 
                            
वतन का कर्ज़ तुम निभा रहे
लिपटे हो मां के आंचल से
देश प्रेम तुम सिखा रहे ।।

जान नही जन की सेवा कर
अपना कर्ज़ निभाते हैं
हंसते-हंसते मातृभूमि को
अपना शीश चढ़ाते हैं।।

फ़क्र, हे भारत माँ! तुम पर
जन्म दिया जांबाजों को
बग़ैर जान की फिक्र किये
शत्रुओं को मार भगा रहे।।

वतन के रखवालों पर हमला
कायरता का पर्दाफाश हुआ
पुलवामा की धरती रोयी
मानवता का उपहास हुआ।।

लहू टपक रहा माथे से
फिर भी तिरंगा हाथों में
जख़्मी शेर,शत्रु विध्वंसक!
सिंहों सा तुम दहाड़ रहे ।।

मानो पुष्प खिले पुष्पों में
मुरझाने का नाम नहीं
मातृभूमि के कदमों में,
खुशबू सदा बिखेर रहे ।।
(भारत की जल,थल,वायु सेना को समर्पित)

ज़हीर अली सिद्दीक़ी

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6 वर्ष पहले

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