टूटा - टूटा सा हूँ मैं,
और टूटे से जज्बात मेरे,
तूने अब तक जो न पूछा,
कैसे हैं हालात तेरे ?
तेरी यादों की जंजीरों से,
कैसे हूँ अब तक बंधा हुआ,
तेरी खातिर मैने न जाने,
हाल है कैसा बना लिया।
राह कोई न सूझे मुझको,
अब तुझसे ही है आशा,
जब-जब तुझको ढूँढू मैं,
बस लगती हाथ निराशा।
पागल पथिक-सा हूँ मैं,
तेरी खोज में भटक रहा,
क्या सहना वो भी है मुझको,
जो अब तक है नही सहा ।
संघर्षों का ही जीवन है,
फिर संघर्ष से क्यों डरें,
तुझको पाने की आशा में,
टूटेंगे सपने भी कई मेरे।
टूटा - टूटा सा हूँ मै......
- युवराज सिंह 'बृजेश,
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