सपनों का घर तो बदल दिया ,कुछ कर पाएंगे पता नहीं
सफ़र अभी तो शुरू हुआ है ,कब तक चलना है पता नहीं
जल कर के हम राख़ हो गए ,कब तक तपना है पता नहीं
उम्मीदों के दरिया में इतना डूब चुका हूं मैं
याद किया तो पता चला अपना सपना ही पता नहीं
अपनी उम्र से अधिक बड़ा हूं मैं
परिवार के लिए खड़ा हूं मैं
कठिनाई के पर्वत पे बचपन से चढ़ रहा हूं मैं
एक अरसा बीत गया अब तो,कब तक चढ़ना है पता नहीं
खुद ही खुद से बातें करता हूं, खुद ही दिन में रातें करता हूं
आंसू से आंखें भरता हूं,कब तक भरना है पता नहीं
{आदर्शवादी "युवराज"}
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