तुम एक प्रकाशित दीपक हो,
मैं दीप तले का अँधियारा,
तेरी किरणों से आलोकित,
बस छोड़ मुझे, यह जग सारा।
कभी किरण न पड़ेगी मुझ पर,
माना यह भी है, जग-जाहिर,
लेकिन क्या उदधि तरंगों को,
मिलता नहीं - कभी साहिल ।
बड़भागी है मुझसे वह पंतंग,
जो आंलिगन तुझसे कर पाए,
तेरे - आग़ोश में आकर के,
प्राणों की आहुति दे जाए।
भले मिले न मुझे- कभी,
किरणों से -तेरी उजियारा,
ऐ दीपक ! तुम करते रहना,
बस रौशन- यह जग सारा।
- युवराज सिंह 'बृजेश'
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