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विचलन एवम लक्ष्य संघर्ष

                
                                                         
                            आज उठी कलम तो लिख डालूँ,
                                                                 
                            
जो दुखड़ा है मेरे मन का,
तेरे प्रति जो सहेज लिया,
हृदय में प्रेम तिनका-तिनका ।
जब-जब देखा है मैंने,
तेरी उजली तस्वीरों को,
पढ़ना-लिखना मैं भूल गया,
बस याद रहा तेरा मुखड़ा ।
मन में उमंग उठी मेरे,
बस अब तुझको ही पाना है।
जब-जब मैंने इजहार किया,
तब-तब टूटे जज्बात मेरे।
न टूटे सिर्फ जज्बात मेरे,
मैं भी अंदर से टूट गया,
जोड़ा था जो प्रेम तेरी खातिर,
पर वह अब तक न छूट सका।
अब तो हर पल बस तेरी ,
यादों में जीते रहते है,
दुनिया की दुनियादारी,
के रंगों से बचते फिरते है,
सब-कुछ भूला - भूला-सा हूँ,
बस तेरे साये से लिपटा लिपटा ।
आज उठी कलम तो लिख......

- युवराज सिंह 'बृजेश '
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

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