प्यास बुझती नहीं,इन आबशारों से अब।
कश्ती दूर जा चुकी है , किनारों से अब।।
वाबस्ता नहीं, किसी मंज़र से आजकल।
मेरा कोई वास्ता नहीं है, नज़ारों से अब।।
बागबां की ताकीद का भी ध्यान है मुझे।
इसलिए रखता हूं कुरबत ख़ारों से अब।।
सहरा में, सायबान की तलाश बहुत की।
साये की तवक्को नहीं , चिनारों से अब।।
आदतन, क़ैद-बाम-ओ-दर हुआ नहीं मैं।
मुझे घेरा है रिवाज़ो की दीवारों ने अब।।
वफ़ा का सिला वफ़ा मिले अब मुझको।
ये गुज़ारिश है , वफ़ा के मजारों से अब।।
-यूनुस खान
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